दिव्य विचार: तय करें, हमारे लिए क्या अच्छा है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि छिद्र सहित नाव में निरन्तर जल का प्रवेश हो रहा है, नैया डगमगा रही है, उसका संतुलन खो रहा है और अब तब डूबने की स्थिति में है। ऐसी स्थिति में इस नाव को बचाया कैसे जाय ? संत कहते हैं सबसे पहले उन छिद्रों को बन्द करो, जिनसे कि जल का प्रवेश हो रहा है। फिर उसमें संचित जल को उलीचो। तुम्हारी नाव का संकट अपने आप दूर हो जायेगा। अनवरत कर्म का आगमन हमारी आत्मा में हो रहा है, कर्म का रिसाव हमारे जीवन में हो रहा है, जिससे हमारी आत्मा का कर्म से जुड़ाव हो रहा है, उससे बचें कैसे ? संत कहते हैं - जिन-जिन छिद्रों से तुम्हारी आत्मा में कर्म का जल प्रवाहित होता है, प्रविष्टि करता है, उन छिद्रों को बन्द करो। कल मैने कुछ छिद्रों की चर्चा की थी, वे हैं मिथ्यात्व, असंयम, आलस्य, कपायों का उद्वेग और दुष्प्रवृत्तियाँ। संवर भावना में इन्हीं सभी के विरोधी विचार किये जाते हैं। और आत्मा में एक ऐसी शक्ति एवं क्षमता उत्पन्न की जाती है, जिसके बल पर हम अपने आपको सुमार्ग में स्थित करने की सामर्थ्य प्राप्त कर सकें। मुझे मालूम है, कि 24 घण्टे मेरी आत्मा में कर्म प्रविष्ट होते हैं। आखिर इससे बचने का कोई उपाय तो होना चाहिए। इसके लिए हमें उस मार्ग में प्रवृत्त होना पड़ेगा। हमारे साथ एक बहुत बड़ी दुर्बलता है, हम धर्म के महत्व को समझते हैं और अधर्म के प्रभाव को भी जानते हैं, लेकिन इसके बाद भी अधर्म से दूर नहीं होते और धर्म को अंगीकार नहीं कर पाते। हमारी प्रवृत्ति दुर्योधनी प्रवृत्ति बनी हुई है।
यथा-जानामि धर्म न च मे प्रवृत्तिः, जानामि अधर्म न च मे निवृत्तिः ।
मैं धर्म को जानता हूँ, लेकिन उसमें प्रवृत्त नहीं होता। अधर्म के फल को भी जानता हूँ, लेकिन उससे दूर नहीं हटता। ऐसे जानने का फायदा क्या है ? हमें यह पता है कि हमारे लिए अच्छा क्या है और बुरा क्या है? यह सब हम जानते हैं। यदि धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य की विवेचना के लिए किसी को भी बोल दिया जाये तो वह इतना तो जानता है कि क्या बुरा है और क्या अच्छा है। इस बात की विवेचना भी बहुत कुशलता से कर सकता है।






