दिव्य विचार: मन में दृढ़ संकल्प होना चाहिए- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि हमारे जीवन के साथ एक बहुत बड़ी बिडम्बना है कि हम अच्छे को अपना नहीं पाते और बुरे को छोड़ने में समर्थ नहीं हो पाते। आखिर क्यों ? कौन रोकता है ? इसे रोकता है हमारे भीतर का संस्कार, जो हमारे अवचेतन मन में गाढ़ संस्कार छिपा हुआ है वह संस्कार रोकता है और जब तक हम उन संस्कारों का विलयन नहीं कर देते, उनको नष्ट नहीं कर देते, तब तक हमारे भीतर शुभ संकल्प जागृत नहीं होते। और जब तक शुभ संकल्प जागृत नहीं होते, तब तक धर्म के मार्ग पर लगने की सच्ची प्रेरणा हमारे भीतर उत्पन्न नहीं हो सकती । वे शुभ संकल्प कैसे जागृत हों, इसके लिये संवर भावना है। संवरभावना का मतलब है निरन्तर अपनी आत्मा को पाप से बचाने की चिंता और चिंतन । कैसे मैं अपने आपको पाप से बचा सकूँ और कैसे मैं इन दूषित संस्कारों से अपने आपकी रक्षा कर सकूँ, इस प्रकार के चिन्तन का नाम ही है संवरभावना । कर्म हमारी आत्मा में प्रविष्ट हो रहे हैं, उनको रोकें कैसे ? निरन्तर जो व्यक्ति कर्म के आगमन के प्रति सजग होता है और उसके साथ-साथ कर्म के आगमन को रोकने के लिए प्रयत्नशील होता है, उस व्यक्ति की वृत्ति और प्रकृति दोनों अपने आप परिवर्तित हो जाती हैं। उस व्यक्ति का जीवन भीतर से रूपान्तरित-सा परिलक्षित होने लगता है। आस्रवभावना में हमने कर्मों के आगमन का अवलोकन किया। हमने अपना अन्तर्विश्लेषण किया। हमारी दृष्टि में वे सारे छिद्र आये, जिनसे कि हमारी आत्मा कलंकित होती है। जिनसे हमारी आत्मा में विकृति का जमाव होता है या जिनके कारण हमारी आत्मा की दुर्गति होती है। ये सब बातें हमें आम्रवभावना के चिन्तन से समझ में आ गयीं। ये सारी प्रवृत्तियाँ जीवन को दुर्बलताओं की ओर ले जाती हैं। आत्मा का पतन कराती हैं। संवर के माध्यम से हम अपनी सुरक्षा की सामथ्र्य अपने भीतर में प्रकट करने में सक्षम हो जाते हैं। जिन छिद्रों से कर्मों का आगमन हो रहा है, उन्हें रोका जाय और उन्हें रोकने के लिए हमारे मन में दृढ़ संकल्प होना चाहिये। जब तक हमारा संकल्प स्थिर नहीं होता तब तक हम अपने आपको दुष्प्रवृत्तियों से बचा नहीं सकते ।






