दिव्य विचार: संकल्प हमेशा दृढ़ होना चाहिए- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि कई बार ऐसा देखने में आता है कि व्यक्ति सोचता है कि मैं ऐसा कर लूँ, लेकिन कर नहीं पाता। उसका कारण यह कि उसका संकल्प बहुत लचीला होता है। जिनका संकल्प लचीला होता है वे कभी सफलता को प्राप्त नहीं कर सकते । दृढ़संकल्पी मनुष्य ही सफलता की ऊँचाइयों का स्पर्श कर सकता है। ऐसे ही व्यक्तियों के प्रयत्न सिद्धि में परिणत हो सकते हैं, जिनका संकल्प दृढ़ हो । संकल्प दृढ़ कब होगा ? जब हम अपने मन पर भावनाओं का पुट डालेंगे। जैसे कोई व्यक्ति अपने आपको चारों ओर से असुरक्षित महसूस करता है, तो तुरन्त ही सारी शक्तियों का संयोजन करके उनसे बचने का प्रयत्न करता है। जब आप अपने आपको असुरक्षित महसूस करते हैं, तो सुरक्षा का भाव अपने आप जाग उठता है, लेकिन जब आप अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं, तब आप बेखबर बैठे रहते हैं। संवर और आम्रवभावना की उपादेयता केवल इतनी ही है कि जहाँ हम चारों ओर से असुरक्षा के वातावरण से घिरे होते हैं तो ये भावनाएँ हमें जागृत कर देती हैं। संवर भावना हमें सुरक्षा के लिए ढाल और तलवार प्रदान करती है अथवा स्वयं संवरभावना ही सुरक्षा कवच बन जाती है। जिन रास्तों से विकृतियाँ आ रहीं हैं, संकट आ रहे हैं, पाप के दरवाजे हैं, उनको बन्द करना है। इनसे बचना । यदि मैने नाव को खेया है तो उस पार पहुँच कर ही दम लेना है। बीच में रुकना नहीं चाहिए। मेरी सामर्थ्य और कुशलता में इसी बात में है कि मैं अपनी जर्जर नाव को भी इस पार से उस पार उतार लूं। यह प्रेरणा, यह संकल्प अपने भीतर जब तक जागृत नहीं होगा, तब तक संवरभावना को अपने मन में भाते रहें। मैंने पहले दिन भावनाओं के विषय में चर्चा करते हुये कहा था कि वस्तुतः हमारा चरित्र और कुछ नहीं, हमारी अच्छी-बुरी भावनाओं का पुंज है। हमारे मन में जैसी भावनायें जगती हैं वैसे ही संस्कार बनते हैं, और जैसे संस्कार बनते हैं, वैसा ही हमारा चरित्र बनता है। कुल मिलाकर हमारे चरित्र की निर्धारक हमारे मन की भावनायें होती हैं। जैसी भावना हम अपने मन में डालेंगे, वैसा हमारा चरित्र बनेगा।






