दिव्य विचार: चेतना को अंतर्मुखी बनाओ- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि अपने जीवन में संवर को अवतरित करना चाहते हो तो चेतना को अन्तर्मुखी बनाओ, उन तमाम छिद्रों को बन्द करो, जिनसे कि कर्म का आगमन होता है। कल जितनी बातें साधना के क्षेत्र में कहीं, उनसे विरोधी बातों को हमारे संत हमें समझाते हैं कि इन पर अपनी बुद्धि को जमाओ। इन्हें अपनाने का प्रयत्न करो, पुरुषार्थ करो। तुम संसार में रहकर भी संसार में डूब नहीं सकोगे। संवर करने वाले हैं - सम्यक्त्व, व्रत, कषायों का निग्रह और विशेष-विशेष रूप से की गयी साधनायें। जिनके बल पर हम अपनी तमाम दुर्बलताओं पर अंकुश लगा सकते हैं। एक क्षण ऐसी सामर्थ्य विकसित कर सकते हैं कि जिसमें तमाम प्रवृत्तियों से ऊपर उठा जा सके। सबसे पहला है - सम्यक्त्व । देह में जो आत्मभाव बना रहता है, उससे ऊपर उठें। जब तक शरीर में ममत्व बुद्धि बनी रहेगी, तब तक ऐसे प्राणी बहिरात्मा बने रहेंगे। उस बहिरात्मपना को, जो पर-पदार्थों में ही आत्मबुद्धि रखता है, जिसे संसार और संसार के सम्बन्ध ही प्रिय लगते हैं, जिनका बाह्य पदार्थों के प्रति बड़ा आत्मीय भाव से जुड़ाव रहता है, उनकी उत्पत्ति में अपनी उत्पत्ति एवं उनके विनाश में अपना विनाश मानकर चलने वाले लोग, वास्तविकता से अनभिज्ञ होते हैं और यथार्थ से दूर रहने के कारण, वे बहुत सारे दुष्कर्मों को अपनी आत्मा में आस्रवित करते रहते हैं। संत कहते हैं - सही समझ विकसित करो, देह में रहकर भी उसके भीतर विराजमान विदेही आत्मा को अपनी दृष्टि का विषय बनाओ। तुम्हारी बुद्धि उस पर केन्द्रित होनी चाहिए। शरीर में आत्मबुद्धि का नाम मिथ्यात्व है और आत्मा में आत्मबुद्धि का नाम सम्यक्त्व है। जो देहात्म में विभ्रान्त हैं, वे संसार को बढ़ाते हैं और जिनकी भ्रान्ति का उन्मूलन हो जाता है वे संसार को समेट लेते हैं। एक ज्ञानी और अज्ञानी की यही पहचान है। अज्ञानी के भीतर संसार रहता है और ज्ञानी संसार में रहता है। संसार में रहना और अपने भीतर संसार को बसाना, इन दोनों में बहुत अन्तर है । वस्तुतः हमारा संसार बाहर का संसार नहीं है, संसार तो हमारे भीतर अहंकार और ममकार का है।






