दिव्य विचार: आत्मा के स्वरूप को समझने की कोशिश करें-  मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: आत्मा के स्वरूप को समझने की कोशिश करें-  मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि जब तक संसार पल्लवित होता रहेगा, तब तक हमें भेदविज्ञान नहीं होगा। जब तक हम सम्यक्त्व से मंडित नहीं होते, जब तक हमारे भीतर आत्मा की सही समझ विकसित नहीं होती, तब तक हम अपने जीवन के उद्धार की भूमिका नहीं बना सकते। इसलिए यह पहली आवश्यकता है, उस भेदविज्ञान को प्राप्त करने की। कैसे भेदविज्ञान को प्राप्त किया जाये ? भेदविज्ञान को तभी प्राप्त कर सकोगे जब निरन्तर आत्मा के चिन्तन में अनुरक्त रहोगे। आत्मा के स्वरूप को समझने की कोशिश करोगे। रातदिन उसके मनन में लगे रहोगे और जिन्होने भेदविज्ञान प्राप्त कर लिया है, ऐसे साधु-सन्तों के सम्पर्क में रहोगे। कहते हैं - रत्न की परख केवल जौहरी को होती है। साधारण व्यक्ति को नहीं होती। परख को पाने के लिये व्यक्ति को, अपनी आँखों को पारखी बनाना पड़ेगा। उसको जौहरी के चरणों में बैठकर ही सीखा जा सकता है। अगर तुम रत्न को परखना चाहते हो, कांच और कंचन का भेद जानना चाहते हो तो उनके सम्पर्क में आने की कोशिश करो। जिन्हें वस्तु तत्त्व की वास्तविक परख हो गयी है, जो भेदविज्ञानी हैं, जो देह के धरातल से ऊपर उठकर आत्मा के धरातल पर जीने के अभ्यासी हो गये हैं, जिनकी प्रत्येक प्रवृत्ति में उनकी वीतरागता की गन्ध आती है, जिनकी प्रत्येक प्रवृत्ति में उनके भीतर का वैराग्य आभासित होता है, ऐसे साधु सन्तों के सम्पर्क में आओ। उनके चरणों में आने से ही आत्मा के प्रति अनुपम अनुराग जागृत होता है। जिस क्षण आत्मा का अनुराग विकसित होता है, उसी समय विषयों से, संसार से, वैराग्य और उदासीनता का भाव अपने आप प्रकट होने लगता है। यह उदासीनता की वृत्ति, यह वैराग्य हमारे जीवन में सम्यक्त्व का मार्ग प्रशस्त करता है। सम्यक्त्व का मतलब जीवन को समीचीनता से जोड़ देना है। सम्यक्त्व की प्राप्ति का मतलब जीवन में सही समझ विकसित हो जाना है। सम्यक्त्व की प्राप्ति का मतलब है दृष्टि का निर्मल हो जाना। और यह जब तक नहीं होगा, तब तक हम कुछ भी नहीं कर सकेंगे।