दिव्य विचार: मर्यादित और नैतिक आचरण रखें - मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: मर्यादित और नैतिक आचरण रखें - मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि त्याग के मार्ग पर आप जितना बन सके उतना चलने की कोशिश करो। ब्रह्मचर्य को पूर्णतया धारण न कर सको तो कोई बात नहीं। अपनी पत्नी या पति में संतुष्ट रहने की कला तो सीख सकते हैं। मर्यादित और नैतिक आचार के साथ अपने जीवन को आगे बढ़ाया जा सकता है। इसी स्वदार संतोषव्रत का नाम ब्रह्मचर्य अणुव्रत है। परिग्रह को पूरी तरह नहीं छोड़ सकते, तो परिग्रह की लिप्सा पर तो अंकुश लगा सकते हैं। धन की चाह से मुक्त नहीं हो सकते, पर धन की चाह में धनान्ध बनने से तो बच सकते हैं। पैसा कमाना नहीं छोड़ सकते, पर पैसा कमाने के पीछे पागल होने से तो बचा जा सकता है। यही तो एक व्रत है। यह व्रत का स्थूल रूप है। ऐसे व्रतों को अंगीकार करने की भावना अच्छे-अच्छे लोगों के मन में नहीं जाग पाती। क्योंकि जिस ढर्रे में वे जी रहे होते हैं, उसी प्रकार जीने का आनन्द वे खोजते रहते हैं। जैसा जो कुछ चल रहा है, उसी के अनुरूप चलाना चाहते हैं। काँटों पर पैर रखना चाहते हो और जीवन को सुखी बनाने का सपना देखते हो, क्या यह संभव है ? पाप के रास्ते में चलते हैं और सोचते हैं कि हमारे जीवन में संकट न आये, क्या यह संभव है ? विषयों में रस लेते हैं, और चाहते हैं कि हम मुक्त हो जायें। संभव नहीं है। यदि अपने जीवन को सच्चे अर्थों में सुखी बनाना चाहते हो, सच्चे अर्थों में कल्याण करना चाहते हो तो फिर अपनी प्रवृत्ति को मोड़ना पड़ेगा, चेतना को जगाना पड़ेगा। चेतना कब जागेगी ? संत चेतना को जगाने का ही काम करते हैं। लेकिन संतों की बात हर किसी पर लागू नहीं होती। यह तो आम्रवृ का चिन्तन है, संवर में क्या करना है ? लेकिन आप जागते कब हो ? जब मोह निद्रा कुछ शान्त होती है। मोहनींद जब उपशमे। जब व्यक्ति की मोह निद्रा कुछ शमित होती है। उसका मोह जब शान्त होता है तो सद्‌गुरु की एक छोटी-सी बात भी उसके हृदय को ऊपर से नीचे तक आन्दोलित कर जाती है। और जैसे ही चेतना आन्दोलित होती है, उपायों का जागरण तो अपने आप हो जाता है। फिर ज्यादा देर उपदेश देने की आवश्यकता नहीं होती।