दिव्य विचार: सारा जीवन कर्म की गुत्थी में उलझा है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि हमारी आत्मा के ऊपर आठ कर्म हैं, जो हमारी समग्र चेतना को प्रभावित किये हुए हैं। वे हैं ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र 'और अन्तराय। ये थोड़ा सूक्ष्म विवेचन के योग्य हैं। गहन दार्शनिक स्तर पर हमें समझने और समझाने की आवश्यकता है। यदि इन्हें आप समझ गये तो जीवन का सारा रहस्य आपके सामने उद्घाटित हो जायेगा। आप इस विषय को थोड़ा गहराई से समझने की कोशिश कीजिएगा। कर्मवाद को समझना साधारण बात नहीं है। यह एक बड़ी जटिल दार्शनिक गुत्थी है। सच्चे अर्थों में देखा जाए तो हमारा सारा जीवन ही कर्म की गुत्थी में उलझा हुआ है। इसे समझें। यह आठ मूलकर्म हैं। जो हमारी आत्मा को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। सबसे पहला कर्म है - ज्ञानावरण । ज्ञानावरण कर्म हमारे ज्ञान को आवरित करता है। हमारे ज्ञान को ढाँकता है। यह कर्म वैसा ही है जैसे मेरे और आपके बीच यदि एक परदा लगा दिया जाये तो हम न आपको देख सकते है और न आप हमें। यह परदा जैसे हमें और आपको एक दूसरे को देखने में बाधा पहुँचाता है, वैसे ही यह ज्ञानावरण कर्म एक ऐसा आवरण है, जो हमारी आत्मा की ज्ञानशक्ति को रोकता है। हमारे आपके सबके ज्ञान में एकरूपता नहीं है। तरतमता है। यह सब उस आवरण की सघनता और विरलता का प्रभाव है। जिसका आवरण जितना सघन होता है, उसका ज्ञान उतना मन्द होता है और जिसका आवरण जितना विरल होता है उसका ज्ञान उतना ही प्रखर होता है। ज्ञान यद्यपि आत्मा की विशिष्ट शक्ति है। स्वाभाविक तेज रूप है। लेकिन ज्ञानावरण कर्म आत्मा के उस तेज को पूर्णतः अभिव्यक्त नहीं होने देता है। जैसे सूर्य के ऊपर जब घटाएँ छा जाती हैं तो उसका प्रकाश पूर्णतः अभिव्यक्त नहीं हो पाता है। ऐसे ही जब तक हमारे ऊपर इस ज्ञान के आवरण की घटाएँ छायी रहती हैं, ज्ञान का तेज ठीक ढंग से प्रकाशित नहीं हो पाता है।






