दिव्य विचार: सोए रहोगे तो कर्म नचाता रहेगा- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि आस्रव भावना कहती है - इसे समझो। उनके आगमन के कारण को जानो और उनके निवारण के उपाय को सीखो। बहुत सुन्दर उदाहरण दिया है - जैसे किसी नाव में छिद्र हो तो छिद्र से उसमें जल भरेगा। नाव में पानी प्रविष्ट होगा तो नाव का भार बढ़ेगा और नाव का भार बढ़ेगा तो उसका संतुलन बिगड़ेगा। संतुलन बिगड़ने से उसके डूबने की सम्भावना होती है। जैसे सछिद्र नाव डूब जाती है, ऐसे ही आम्रव ऐसा छेद है जो हमारी आत्मा में कर्म रूप जल का प्रवाह भरता है और जिससे हमारी आत्मा रूपी नैया भवसागर में डूब जाती है। वह आम्रव है, जहाँ से कर्म आते हैं। कौन-कौन से छिद्र हैं और कहाँ-कहाँ से आते हैं, इसका विचार करना और उन छिद्रों को बन्द करने का सम्यक् प्रयत्न ही आम्रव भावना का सार है। जिसके माध्यम से हम संसार में रहें जरूर लेकिन कर्मरूपी रज से बच सकें। कर्म के प्रवाह से बच सकें। कर्म के प्रभाव से बच सकें। जीवन में जो विभाव हावी हो रहा है उसे दूर कर अपने स्वभाव को उपलब्ध कर सकें। वस्तुतः कर्म विभाव है, लेकिन बड़ा ताकतवर है। वह हम पर काबिज कर बैठा है और हम उसके आगे आत्मसमर्पण किए हुए हैं। कर्म हमें जैसा नचाता है, हम उसी तरह नाचते हैं। प्राणीमात्र की स्थिति उस कठपुतली की तरह हो जाती है जो दूसरों के इशारे पर नाचती है। कठपुतली अपनी इच्छा से कुछ नहीं करती। सामने वाला जैसे नचाता है, वैसे ही नाचती है। कर्म हमें कभी नरक, कभी पशु, कभी देव, कभी मनुष्य, कभी राजा, कभी रंक, कभी अमीर, कभी गरीब, कभी सम्पन्न, कभी विपन्न, कभी रूपवान, कभी कुरूप, कभी अच्छा, कभी बुरा, कभी प्रसन्न, कभी खिन्न आदि ये सारे खेल खिलाता रहता है। यह कब तक चलता रहेगा ? जब तक तुम सोये रहोगे। जब तक तुम्हारी आत्मा नहीं जागती, जब तक तुम्हारा आत्मपुरुषार्थ प्रकट नहीं होता, जब तक तुम इस कर्म की सत्ता का विच्छेद नहीं करते, तब तक यह खेल चलता रहेगा।






