दिव्य विचार: जो कर्म है वह हमारा स्वभाव नहीं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: जो कर्म है वह हमारा स्वभाव नहीं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि हमारी आत्मा में प्रतिपल कर्मों का रिसाव होता रहता है, कर्मों का बहाव होता रहता है, कर्मों का धरना होता है। ये कर्म ही हमारे जीवन में इन्द्र और दुविधा उत्पन्न करते हैं। कर्म वह शक्ति है जो जीवन में विषमता और जगत में विविधता को जन्म देती है। जगत् में हमें विविधता दिखाई देती है। उसमें एकरूपता नहीं दिखाई देती। कोई रूपवान् है कोई कुरूप, कोई सम्पन्न है कोई विपन्न, कोई पण्डित है कोई मूर्ख, कोई समझदार है कोई पागल, कोई यशकीर्ति से युक्त है किसी का अपयश है, किसी के पास वर्चस्व और प्रभुत्व है किसी के पास कुछ नहीं, कहीं महल है कहीं टूटा छप्पर भी नहीं, कोई कोठियों में आनन्द ले रहा है तो किसी को फुटपाथ पर अपनी जिंदगी बितानी पड़ रही है, किसी के पास सब कुछ है तो किसी के पास कुछ भी नहीं है, कोई शिखर पर है तो कोई रसातल में है। आखिर यह विविधता किसने उत्पन्न की ? जीवन की विषमता और जगत् की विविधता का जो मूल कारण है, वह कर्म है। कर्म के निमित्त से ही हमारे जीवन में विषमता आती है। कर्म के निमित्त से ही जगत् में विविधता आती है। सबसे मजे की बात तो यह है कि जो कर्म है वह हमारा स्वभाव नहीं है, विभाव है। हमारा अपना नहीं है, पराया है। हमने उस पराये को अपना लिया है, आत्मसात् कर लिया है। वह पराया जब हमारी चित्तभूमि में, हमारी चेतना में अतिक्रमण करके बैठ जाता है, तो हमारे आत्मा के स्वभाव की निकासी हो जाती है। हमारी आत्मा का स्वभाव हमसे दूर हो जाता है और विभाव हम पर हावी हो जाता है। जैसे कोई आपके घर में आकर कब्जा कर ले। उस व्यक्ति की स्थिति कैसी विषम होगी, जिसके मकान में दूसरा व्यक्ति कब्जा कर ले। स्वयं मकानमालिक होते हुए भी मकान से बाहर निकलना पड़े। यही स्थिति हमारी आत्मा की है। हमारी आत्मा के जो मूल गुणधर्म हैं, इन कर्मों के विभाव के प्रभाव से सबको बाहर होना पड़ रहा है। उनकी शक्तियाँ प्रभावित हो रही हैं। आत्मा की शक्ति कुंठित हो रही है। आत्मक्षमता सुप्त होती जा रही है।