दिव्य विचार: साधना के लिए आत्म केन्द्रित होना जरूरी- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि आध्यात्मिक साधना के लिए आत्मकेन्द्रित होना जरूरी है। आत्मा पर केन्द्रित होने के लिए अन्तर्मुखी चेतना का जागरण जरूरी है। जब संसार के बाहरी सम्पर्कों से अपनी दृष्टि को पृथक् कर स्वयं को स्वयं पर केन्द्रित करते हैं, तब हमारी अन्तर्मुखता अभिव्यक्त होती है और उस अन्तर्मुखता से निःसृत प्रकाश हमें जीवन में आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करता है। विगत दिनों इसी आशय की बात आप सबके मध्य की गई। बारह भावना में अनित्यता से बढ़ते हुए अशुचिता तक आये हैं। शरीर अशुचि का भण्डार है। जब तक हमारी बुद्धि शरीर से परे आत्मा पर केन्द्रित नहीं होती, तब तक सच्चे अर्थो में हम अपने जीवन का कल्याण नहीं कर सकते। अब आज उसे और आगे बढ़ाने की बात आ रही है। चिन्तन को और गहरा बनाने की प्रेरणा दी जा रही है। शरीर ही नहीं, शरीर के अन्दर जो तुम्हारे विचारों का जगत है, उस पर दृष्टिपात् करने की कोशिश करो। शरीर से भिन्न तो तुम हो ही। तुम्हारे भीतर जो नितप्रति उत्पन्न होने वाले विचार हैं, वे भी तुम नहीं हो। तुम्हारा अपना स्वरूप वे नहीं हैं। वे तुम्हारे अपने स्वभाव नहीं हैं। नितप्रति तुम्हारे मन में कभी राग उत्पन्न होता है, कभी द्वेष, कभी हर्ष, कभी विषाद, कभी प्रसन्नता, कभी खिन्नता, कभी दुःख, कभी सुख, कभी हास्य, कभी शोक, कभी उल्लास, कभी उदासी आदि ये जो उत्पन्न हो रहे हैं वे क्यों हो रहे हैं ? हम अपने जीवन पर जब भी दृष्टिपात करते हैं, तो वह विषमताओं से जकड़ा दिखाई देता है। जीवन में कहीं एकरूपता दिखाई ही नहीं देती। संत कहते हैं यह क्या है? इसका विचार करो। यह सब तुम्हारे स्वभाव नहीं हैं, यह विभाव हैं। तुम्हारे अन्दर कभी क्रोध भरता है, कभी मान, कभी माया, कभी लोभ, कभी राग, कभी द्वेष, कभी मोह, कभी मद- ये सभी क्या हैं ? तुम्हारे चित्त की भूमि में उत्पन्न होने वाले विकार हैं। इन विकारों की सृष्टि कहाँ से होती है, कौन है इनका जनक कौन है इनका जन्मदाता ? इनका आविर्भाव कब तक तुम्हारे चित्त पर छाया रहेगा ? इसका विचार करना ही आसवभावना है।






