दिव्य विचार: मन, वाणी और शरीर को नियंत्रित करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि मन, वाणी और शरीर तीनों की प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण प्रत्येक समय बनाये रखना चाहिए। आप देखें कि मन कहीं भटक तो नहीं रहा है। मन कहीं बहक तो नहीं रहा है। जैसे ही मन भटकता प्रतीत हो, मन बहकता प्रतीत हो, उसे रोकिए। यह पहला प्रयास करना होगा।
मन पर कसें लगाम
आचार्यों ने कहा- मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । अर्थात मनुष्य का मन ही कर्मबन्ध और मुक्ति का कारण है। यदि मन विषयों में आसक्त होता है तो बन्ध करा देता है। अगर निर्विषय होता है तो मुक्ति का साधन बन जाता है। इसलिये मन ही बन्धन और मुक्ति का कारण है। उसे आप समझें, उसे नियन्त्रित करें। जिस मन से हम पाप करते हैं उसी मन से पाप को साफ भी किया जा सकता है। जागृत मन पाप का संशोधन करता है, चुस्ती की स्थिति में मन विकृतियों को भगाता रहता है। अपने मन के मालिक बनें, उसके प्रति सजग / सावधान रहें तो हम निरन्तर पाप से बच सकते हैं। सच पूछा जाए तो जितना पाप हम मन से करते हैं, उतना पाप वचन और कार्य से नहीं कर सकते। हमारी सबसे ज्यादा प्रवृत्ति मन से होती है। इस मानसिक प्रवृत्ति को तत्त्व के चिन्तन में निरन्तर लगाया जा सकता है। प्रवृत्ति कम हो, उसे शान्त और संयत बनाया जाये तो उसके रोकने की शुरुआत करने की भूमिका बनती है। यह भूमिका बनना ही संवरभावना को प्राप्त करने में सार्थक सिद्ध होती है। वाणी होवे वीणा जैसी, दूसरे स्तर पर वाणी पर संयम होना चाहिए। व्यक्ति कभी भी कुछ भी बोल देता है । बोलते समय एक बार मुँह में उत्पन्न हुआ शब्द कुछ सेकेण्डों में निकल तो जाता है परन्तु उसका परिणाम जीवन भर या अनेक जीवनों में भोगना पड़ता है। एक वाक्य है जो अनेक को एक कर देता है और एक वाक्य लाखों में बाँट देता है। जिव्हा वाणी का ऐसा वशीकरण है जो हजारों को एक सूत्र में बाँध देता है। वाणी एक ऐसा विस्फोटक तत्त्व है, जो लाखों का शिर कलम करा सकता है। दोनों स्थितियाँ इसके साथ हैं। वाणी के असंयम से बचना भी बहुत जरूरी है।






