दिव्य विचार::मन को धीरे-धीरे नियंत्रित करें-:मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार::मन को धीरे-धीरे नियंत्रित करें-:मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि मन को नियन्त्रित कैसे किया जाए ? उसके लिए सबसे सरल विधि है, जिस समय आपके मन में आवेग अथवा उद्वेग उत्पन्न हो, उस समय आप मन को एकदम रोक नहीं सकते। कोई बात नहीं। मन को बदला जा सकता है। मोड़ दो उसकी दिशा को। आप बच जाओगे। इसी को मार्गान्तरीकरण कहते हैं। मन को मोड़ने की बात अर्थात् उपयोग की धारा को बदलने की बात है। मन में यदि विचलन की स्थिति हो जाय तो आप मन को धीरे से मोड़ दें। आपका सारा काम हो जायेगा। मन को नियन्त्रित करने के दो उपाय हैं - एक तो हम मन के प्रवाह को बदलें, दूसरा उसे सम्यक् दिशा की ओर मोड़ें। अनुप्रेक्षाएँ मन के प्रवाह को मोड़ने का एक बहुत अच्छा माध्यम हैं। इन भावनाओं के बल पर ही हम अपने मन को सही समझाइश देने में सक्षम हो सकते हैं। संत कहते हैं- जब मन में ऐसी हलचल होने लगे, मन के विकार अपने जीवन को विकृत करने लगें, मन में बहुत ज्यादा बेचैनी हो तो मन को मोड़ दो। उसको मोड़ना अर्थात् शुभ चिन्तन में लगा देना। अच्छी बातें करना शुरु कर देना। यदि अनुकूलता है तो कुछ स्वाध्याय करना शुरु कर दें, सत्साहित्य को पढ़ना शुरु कर दें। आपका मन जैसे बदलता है, उस संधिकाल में मन को एडवाईस देना प्रारम्भ करें - तुम क्या कर रहे हो, यह तो बहुत अहित है। यदि तुम्हारी बात मैं मान लूँगा तो उसका परिणाम क्या निकलेगा, जानते हो ? ऐसा करना ठीक नहीं। ऐसा प्रयास उनके ही जीवन में संभव हो पाता है, जो मन को अपने नियन्त्रण में रखते हैं। जो अपने मन के मालिक होते हैं। जैसे आपकी दुकान में जो नौकर होता है, वह कभी भी आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता। क्योंकि उन पर आपकी मालकियत है। ऐसे ही जिसकी अपने आप पर मालकियत होती है वह मन की इच्छा को अपने काबू में रखता है। और उसके बिना मन कुछ कर नहीं पाता। लेकिन जो अपने मन के दास बन गए उनको प्रत्येक पल कष्ट का अनुभव करना पड़ता है।