दिव्य विचार: बड़े भाग्य से मिला है मनुष्य जीवन- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि सांसारिक संयोगों की प्राप्ति अत्यन्त सहज है। थोडे से प्रयत्नों से उन्हें पाया जा सकता है। पर यथार्थ- प्रज्ञा को प्राप्त करना अत्यन्त दुर्लभ है। संत कहते हैं कि - तुम्हें यह मनुष्य जीवन मिला, यह यूँ ही नहीं मिला। लोक की अनेक दुर्लभताओं को पार करके तुम इस मनुष्य तन तक पहुँच सके हो। इस मनुष्य जीवन में जितना वैशिष्ट्य है वह सब दुर्लभ से दुर्लभतर है। इन सबके मध्य बोधि की प्राप्ति सबसे ज्यादा दुर्लभ है। बोधि का मतलब है - यथार्थ का ज्ञान । वास्तविकता का बोध, वह ज्ञान जो कल्याण में निमित्त बने, वह ज्ञान जो कल्याणोन्मुखी बनाए, वह बोध जो हमें आत्मा के शोध में प्रवृत्त कर दे, यह सब चीजें बहुत दुर्लभ हैं। इस दुर्लभता का विचार करना ग्यारहवीं भावना है, जिसका नाम है 'बोधिदुर्लभभावना' । संत कहते हैं - तुम अपना अन्तर्मन टटोल कर देखो, तुम आज मनुष्य हुए हो तो कितनी कठिनाई से हुए हो। एक आदमी जब कोई बड़ी या कठिन यात्रा करके लौटता है, तो अपनी पूरी यात्रा का विवरण डायरी में नोट कर लेता है। साथ ही कितनी कठिनाई से उसने अपनी यात्रा की, इसका बखान वह करते नहीं अघाता । कदाचित् हिमालय की चढ़ाई चढ़ने में जो कठिनाई होती है, उसका हमें ख्याल है, उसे हम विस्मृत नहीं करते। लेकिन इस मनुष्य तन को पाने के पीछे जो कठिनाई हमने झेली है उसका हमें कोई आभास नहीं । संत कहते हैं - हिमालय की चढ़ाई चढ़ना तो फिर भी आसान है, लेकिन मानव जीवन को प्राप्त करना, मनुष्यता को आत्मसात् करना बहुत दुर्लभ है। हम अपनी जीवन यात्रा को पलट कर देखें तो हमें समझ में आएगा कि इस मनुष्यता के पड़ाव तक हम कितनी मुश्किल से पहुँचे हैं। हमारी जीवनयात्रा की शुरूआत होती है निगोद की अवस्था से। निगोद चेतना की सबसे सूक्ष्मतम इकाई है। जहाँ हमारी चेतना व्यक्त रूप से प्रकट नहीं हो पाती। हमारी दशा अव्यक्त चेतना से ग्रसित होती है, जिस दशा में सिर्फ जन्म और मरण ही हमारी नियति होती है।






