दिव्य विचार: मौत के प्रभाव से अंधे मत बनो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: मौत के प्रभाव से अंधे मत बनो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि तुम्हारी आत्मा में एक पीड़ा उत्पन्न होगी, कष्ट होगा और यदि यह होने लगे तो समझ लेना कि तुम्हारे कल्याण की शुरुआत हो गयी, कल्याण का मंगलाचरण हो गया। कब होगी समाप्त यह भटकन ? आजकल लोग बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं, लेकिन आचरण के क्षेत्र में अक्सर पिछड़ जाते हैं। संत कहते हैं - लोकभावना हमारे अन्दर वैराग्य उत्पन्न कराने वाली है, संवेग उत्पन्न कराने वाली है। यह संवेग जीवन को अनुशासित करता है। जीवन को ठीक ढंग से मार्गप्रदर्शित करता है। इसलिए बड़ी-बड़ी बातें मत करो, काम करो, अनुभव का लाभ लो। यह कह ज़रूर देते हैं कि हम अनादि से संसार में भटक रहे हैं लेकिन कभी ऐसा लगता है कि हम भटक रहे हैं। तो यह भटकन क्यों है ? जिस क्षण यह प्रश्न तुम्हारे मन में उठेगा, उसी दिन तुम्हारे जीवन के सुधार की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाएगी। तुम्हें कोई दूसरा भटकाने वाला नहीं है। तुम किसी दूसरे के कारण नहीं भटक रहे हो। भटकने के ज़िम्मेदार तुम स्वयं हो। अपने कारण भटक रहे हो, तुम्हें कोई दूसरा नहीं भटका रहा। तुम्हारे भीतर का अज्ञान ही तुम्हें भटका रहा है। जब तक वह रहेगा तुम्हारी भटकन दूर नहीं होगी । तब तक तुम्हारे दुःखों की कहानी का अन्त नहीं होगा । उसे समझो, अन्तर्मन से पूछो - क्या मैं भटक रहा हूँ ? या नहीं। कहाँ से आया हूँ, कहाँ मुझे जाना है? ये प्रश्न तुम्हारे मन में उत्पन्न हों तो इसका समाधान भी तुम्हारे हृदय में प्रकट होगा और यही तुम्हारे जीवन का मार्ग प्रशस्त करेगा। नहीं तो भटकते ही रहोगे। जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकोगे। यह सब मोह का प्रभाव है। जो जान-बूझकर अँधा बना रखा है। उस मोह को जो जीत लेते हैं, उनका जीवन धन्य हो जाता है । उनके जीवन में बहुत बड़ी उपलब्धि घटित हो जाती है। संसारी प्राणी सब कुछ करना चाहता है, लेकिन अपने भीतर के अज्ञान से मुक्ति नहीं पाता । अपने भीतर के मोह को क्षीण नहीं कर पाता।