दिव्य विचार: आत्मिक सुख संसार में कहीं नहीं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: आत्मिक सुख संसार में कहीं नहीं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि मैने सोचा - स्वर्ग में जाऊँगा तो वहाँ सुख मिलेगा। लेकिन स्वर्ग के हाल भी बड़े बेहाल थे। वहाँ की सारी बातें दूर के ढोल सुहावने वाली कहावत है। मैं वहाँ गया तो मुझे वहाँ भी सुख नहीं मिला। जब-जब मैं वहाँ गया तो अपने से ज्यादा वैभव सम्पन्न देवों के वैभव को देखकर मेरे हृदय में ईर्ष्या की आग जलने लगी। मैं उसकी ज्वाला में झुलस-झुलस कर मरता रहा। मेरे अन्दर द्वेष और वैमनस्य बना रहा। मैं अपने प्राप्त वैभव को भोग नहीं सका। दूसरों के वैभव को देखकर रात-दिन जलता रहा, कुढ़ता रहा। शारीरिक कष्ट तो वहाँ नहीं थे, पर मानसिक कष्टों की वहाँ कोई कमी नहीं थी। वहाँ जाने के बाद मुझे जो मानसिक कष्ट प्रतीत हुआ, उससे मुझे याद आई नरकों की, वहाँ की वेदना की। मुझे देव होने के बाद भी अपने स्वामी की आज्ञा से पशु बनकर वाहन के रूप में जुतना पड़ा है। मेरे जीवन की स्वतन्त्रता खंडित हो गयी। मेरे पास सब कुछ था, पर मैं अपनी इच्छानुरूप उनका उपभोग करने का अधिकारी नहीं था। सब कुछ मेरे स्वामी की इच्छा पर निर्भर करता था। यह मेरे लिए बड़ा दुःखदायी था। मुझे लगा कि यहाँ आकर भी मुझे सुख नहीं मिल रहा है। यह बात अलग है कि दुःखों को दूर करने के साधन मेरे पास ज़रूर थे, पर सुख नहीं। बन्धुओ ! सच्चे अर्थों में देखा जाये तो स्वर्ग के देवों को भी सुख कभी मिलता ही नहीं। हमारे गुरु के गुरु, आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज ने बड़ा ही सुन्दर उदाहरण दिया और कहा- आत्मिक सुख संसार में कही नहीं चाहे नरक के नारकी हों या स्वर्ग के देव। दोनों ही दुःखी हैं। स्वस्थ कोई नहीं है, चाहे नरक के नारकी हों या स्वर्ग के देव। सुखी कोई नहीं है। किसी-न-किसी प्रकार का कष्ट तो उनको भी है। जब मैने स्वर्ग, नरक, पशु और मनुष्य सभी गतियों को देखा तो मुझे लगा संसार में सुख कहीं है ही नहीं। यहाँ केवल दुःख है। और वह दुःख प्रत्येक प्राणी भोगता है, अपने अज्ञान के कारण। ऐसे लोक में जीव रातदिन दुःख भोगता है, कष्ट भोगता है। उन कष्टों को समझो ।