दिव्य विचार: अपने जीवन का मूल्यांकन करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि इतनी कम आयु और जीवन होता है कि जितनी देर में हम एक बार श्वॉस लेते हैं उतनी देर में अठारह बार जन्म और मरण हो जाता है। वह चेतना की सबसे जघन्यतम इकाई है। वहाँ से, पुण्य के योग से हम आगे बढ़े, तो कभी पृथ्वी, कभी जल, कभी वायु, कभी अग्नि तो कभी वनस्पति हुए। जहाँ एकमात्र स्पर्शेन्द्रिय के साथ हमने अपना जीवनक्रम बिताया है। उससे भी दुर्लभ है कीड़े-मकोड़ों की पर्याय। कभी दो इन्द्रिय, कभी तीन तो कभी चार इन्द्रिय के रूप में रहे। फिर पंचेन्द्रिय बने तो कभी पशु तो कभी पक्षी बने । इन सब दुर्लभताओं को पार कर हमने मनुष्य जीवन प्राप्त किया है। न जाने कितने जन्मों का पुण्य संयोग फला, तब हम मनुष्य बने। और साधारण मनुष्य ही नहीं बने। मनुष्य होने के साथ-साथ अच्छा कुल पाया, अच्छा परिवार पाया, स्वस्थ शरीर पाया, अच्छी बुद्धि पायी, सर्व प्रकार की धार्मिक अनुकूलताएँ पाई। उनके साथ-साथ धार्मिक रुचि पाई, सद्गुरुओं का सान्निध्य पाया, यह सब सहज नहीं है। संसार में इतने सारे प्राणी हैं, पर कितने लोग हैं जिन्हें यह सब अनुकूलताएँ प्राप्त हैं। बहुतेरे जीव हैं जो इस प्रकार की अनुकूलताओं से वंचित हैं। मनुष्य होकर भी उनके पास मनुष्य जैसा कुछ भी तो नहीं है। बहुत से लोग ऐसे हैं, जिन्हें अपने गुज़ारे की चिन्ता में ही सारी जिंदगी बिता देनी पड़ती है। सच में आप सब लोग बड़े भाग्यवान हैं, जो यह सब चिन्ताएँ आपके साथ नहीं जुड़ी। सर्व प्रकार की अनुकूलताएँ आपने पायी। यह सारी अनुकूलताएँ यूं ही नहीं मिलीं, इसके लिए आपने बड़ा मूल्य चुकाया है, उसे ही समझने और अपनेजीवन का मूल्यांकन करने का अवसर है। वस्तुतः जीवन में जितने भी अनुकूल संयोग मिलते है, वे सहज प्राप्य नहीं हैं। अतीव दुर्लभ हैं, लेकिन विडम्बना यह है कि आज का मनुष्य बाहरी संयोगो को तो समझता है, लेकिन अपने जीवन का मूल्यांकन ही नहीं करता, उसकी दुर्लभता के बारे में नहीं सोचता।






