दिव्य विचार: जीवन के मूल्यों को पहचानो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि आपने कभी सोचा अपने जीवन के बारे में। आपने अपने जीवन से जुड़ी हर चीज़ का मूल्यांकन तो कर लिया, लेकिन कभी अपने जीवन का मूल्य आँका ? तुम्हारे घर में क्या-क्या है, कबाड़खाने से लेकर तिजोरी तक, हर एक चीज़ का मूल्यांकन कर रखा होगा। पर तुम्हारा जीवन कितना कीमती है, इस बारे में विचार किया ? महाराज ! मैने मकान बड़ी मेहनत से बनाया है। मैने सम्पदा बहुत पसीना बहाकर जोड़ी है। यह प्रतिष्ठा भी मैं बहुत मशक्कत के बाद अर्जित कर पाया हूँ। मैं 24 घंटे इसी बात के लिए प्रयत्नरत रहता हूँ कि कहीं से भी मेरी प्रतिष्ठा खंडित न हो, मेरी छवि धूमिल न हो, मुझे कहीं सम्पत्ति का नुकसान न हो, मेरा घर-परिवार सदा फलता-फूलता रहे । क्योंकि मैने इन्हें बहुत कठिनाई से पाया है, सारा जीवन उसमें लगाया है। संत कहते हैं संपदा, प्रतिष्ठा, वर्चस्व, प्रभुत्व आदि के लिए जो जीवन लगाया है, या जिस जीवनी शक्ति का उपयोग किया है, वह जीवन तुमने कैसे पाया, इसका विचार किया है ? जीवन के सभी संयोग तभी तक मूल्यवान हैं, जब तक उनका मूल्यांकन करने वाला भीतर बैठा है। जब तुम्हारा जीवन ही नहीं रहेगा तब जगत के उन जड़ पदार्थों का क्या मूल्य रहेगा ? कभी विचार किया, जब उनका मूल्यांकन करने वाला नहीं रहेगा तब उनका क्या मूल्य होगा ? संत कहते हैं जड़ का नहीं, चेतन का मूल्यांकन करो ! जगत् के संयोग नहीं, जीवन के मूल्य और महत्व को पहचानने की कोशिश करो। तुम्हारे द्वारा जोड़ी गई सारी सम्पत्ति को एक तरफ रखा जाए और कहा जाए कि इस सम्पदा के बदले मुझे दो पल की जिंदगी दे दो तो क्या तुम्हारी सम्पदा तुम्हें जिंदगी दे पाएगी ? विचार करो, वह सम्पदा मूल्यवान् है या तुम्हारी जिंदगी ? वह जड़ पदार्थ मूल्यवान है या तुम्हारे भीतर का चेतन ? यह जीवन की विडम्बना ही कहनी चाहिए कि हमने सदैव जड़ को महत्त्व दिया है, चेतन को नहीं। जो वस्तु हमें जितनी सुलभहोती है, उसके प्रति उतने ही लापरवाह बन जाते हैं और जो वस्तु हमसे दूर होती है उसे पाने के लिए उतने ही लालायित हो उठते हैं।






