दिव्य विचार: तुम्हारे जीवन की कहानी आखिर है क्या ? - मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: तुम्हारे जीवन की कहानी आखिर है क्या ? - मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि तीन लोक हैं- अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोक । एक ही लोक के तीन विभाग हैं। इनमें रहने वाला प्रत्येक जीव जन्म-मरणादिक के कष्टों को अनादि से भोग रहा है। कभी तुम्हें इस बात का आभास हुआ है कि मैने यह मनुष्य जन्म पाया है तो कहाँ से आकर पाया है और जब मेरी मृत्यु हो जाएगी तो मैं कहाँ जाउंगा । हमें इसका कोई पता नहीं । जन्म मिला, हम जीवन जीते हैं और जीवन जीने में इस कदर लीन हो जाते हैं कि इसके आगे-पीछे का हमें कुछ ख्याल ही नहीं रहता। जीवन के पीछे क्या था, इसकी हमें परवाह नहीं और जीवन के आगे क्या होगा ? इसकी हमें कोई चिन्ता नहीं । संत कहते हैं ऐसा करने से क्या होगा ? तुम अपनी भव-भव की भटकन को खत्म करना चाहते हो तो थोड़ा विचार करो, तुम्हारे जीवन की कहानी आखिर है क्या ? तुम इस लोक में कहाँ-कहाँ घूम कर आये हो ? अगर एक कोने में बैठकर तुम इसका विचार करो तो सब बातें तुम्हें समझ में आएँगी और तब तुम्हें ज्यादा कुछ उपदेश देने की ज़रूरत नहीं होगी। यह बात सही है कि हम अनादि से जन्म- मरण के चक्कर में फंसे हैं। चार गति और चौरासी लाख योनियों में हम सदा से भटकते रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी बिडम्बना यह है कि इस भटकन की हमें कुछ स्मृति नहीं है। सारी कहानी हमारी चेतना में फीड है, लेकिन वह हमारी स्मृति की स्क्रीन पर नहीं आ पा रही है। वह फाईल खुल नहीं पा रही है। काश, वह फाईल खुले और हम उस स्मृति को स्क्रीन पर देखें तो फिर ज्यादा उपदेश देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। -'जातिस्मरण' । जातिस्मरण का मतलब है अपने पूर्व के जन्मों की स्मृति। ऐसा कहा जाता है कि जिस मनुष्य को जातिस्मरण हो जाता है, उसे सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हो जाती है। यानि सही दृष्टि उपलब्ध हो जाती है। जब हम अपने अतीत के जन्मों की झाँकी अपनी आँखों से देखते हैं और खुद यह महसूस करते हैं कि मैने अतीत में क्या किया तथा उसका परिणाम क्या मुझे मिला तो हमारा जीवन अपने आप परिवर्तित हो जाता है।