दिव्य विचार: गलतियों से नए अनुभव मिलते है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: गलतियों से नए अनुभव मिलते है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि जब हम अपने इस जीवन में कोई गलती कर बैठते हैं और उस गलती का खामियाजा भुगतने को मिलता है तो हम एक अनुभव का पाठ पढ़ लेते हैं। मुझे इस गलती को दुबारा नहीं दोहराना है। इसी तरह अतीत के जन्मों की स्मृति जब हमारे सामने उभरकर आती है तो हम यह समझते हैं कि वाकई में हमारी दुष्प्रवृत्तियों का कैसा दुष्परिणाम होगा ? जब तक मैं ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति करता रहूँगा, तब तक मैं अपनी आत्मा का उत्थान नहीं कर सकूँगा। उन गलतियों के दर्शन से हमारी आत्मा में एक नयी प्रेरणा जागृत होती है। वह प्रेरणा हमारे अन्तरंग में वैराग्य को उत्पन्न कर देती है। हमारे जीवन की दिशा को परिवर्तित करने का आधार बन जाती है। लोकभावना कहती है - जातिस्मरण तुम्हें हो न हो, यह तो केवल एक आन्तरिक घटना है। क्वचित् कदाचित् किसी को हो तो अच्छा है। यदि नहीं हो तब भी तुम अन्दर झाँको, भगवान् की वाणी पर विश्वास रखो, गुरुओं की वाणी पर भरोसा करो, तो तुम्हें तुम्हारी यात्रा की सारी कहानी समझ में आ सकती है। संत कहते हैं - तुम यात्री तो रहे, लेकिन सारा विवरण भूल गए हो। तुम्हारी सारी यात्रा की कथा संतों के पास उपलब्ध है। लेकिन यदि तुम उसे पढ़ना चाहो, उनके माध्यम से समझना चाहो तो तुम्हें यह बात भलीभाँति समझ में आएगी कि चार गति और चौरासी लाख योनियों के, इस अनादिकालीन भटकन में हमने सिर्फ अशान्ति पायी, दुःख पाया, संत्रास पाया, कष्ट पाया है। इसके अलावा हमने और कुछ पाया ही नहीं। इसको समझने की कोशिश करो। चार गतियाँ हैं - नरकगति, तिर्यचगति, मनुष्यगति और देवगति । सबसे पहले नरकगति की बात हम समझें । नरक अकथनीय दुःखों का पर्यायवाची नाम है ।नरक में हम अनादि से भटकते आए हैं, न जाने कितनी-कितनी बार हम नरक गए। लेकिन आज तक हमें नरकों की कोई स्मृति नहीं है। नरक की बात सुनकर हम घबराते जरूर हैं, लेकिन कभी हमें ऐसा लगता नहीं है कि नरकों के दुःख को भी भोगकर आए हैं।