दिव्य विचार: दृष्टि जैसी रखेंगे वैसी सृष्टि दिखेगी- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: दृष्टि जैसी रखेंगे वैसी सृष्टि दिखेगी- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि ऐसी दृष्टि अपने अन्दर विकसित कीजिये । सारा खेल अपनी दृष्टि का है। यदि एक बार दृष्टि परिवर्तित हो जाती है, तो सब कुछ परिवर्तित हो जाता है। अगर दृष्टि अपरिवर्तित है तो कुछ भी परिवर्तित नहीं हो सकता। इसलिये अपनी दृष्टि को बदलिये। अपनी मान्यता को पक्का बना लीजिये। मानसरोवर में हंस भी तैरता है और बगुला भी तैरता है। दोनों का रंग धवल होता है। दोनों दिखते भी एक जैसे ही हैं। आकृति में अन्तर है। दोनों अगर मानसरोवर में तैरते हैं तो हंस केवल मोती चुगता है और बगुला की दृष्टि केवल मछली पर टिकी रहती है। बन्धुओ, यही स्थिति होती है ज्ञानी और अज्ञानी की। संसार के मानसरोवर में ज्ञानी हंस की तरह तैरता है और केवल आत्मा के मोती चुगता है और अज्ञानी इस संसार के मानसरोवर में विषयों की मछली पकड़कर के दुःख पाता रहता है। क्योंकि उसकी दृष्टि बगुले की भाँति होती है। ज्ञानी की दृष्टि हंस के समान होती है। हंस जैसी स्थिति अपनी बनाइये । हंस कब बनेंगे ? जब हमारे अन्दर विवेक हो। हंस को विवेक का प्रतीक माना गया है। क्योंकि हंस की चोंच में एक ऐसी विशेष शक्ति होती है, ऐसा रासायनिक स्राव होता है कि वह दूध और पानी को अलग-अलग कर देता है। नीर और क्षीर का विवेक कर डालता है। इसी प्रकार ज्ञानी होता है, जो सार और असार की पहचान करता है। जो अपने और पराये का हेय और उपादेय का ज्ञान रखता है, वही ज्ञानी है। ज्ञान से सम्पन्न दृष्टि के कारण वह विषयों के मध्य रहकर भी उससे अलिप्त रहता है। वह विरक्तचित्तता उसके जीवन की स्वायत्तता का आधार बन जाती है। इसलिये कहते हैं कि कदाचित् विषयों में रमना भी पड़े तो उनमें रमें नहीं, दूर रहें। लेकिन क्या करें ? संसार के अधिसंख्य प्राणियों की स्थिति बड़ी विचित्र हो गई है। आचार्यों ने बहुत अच्छा उदाहरण दिया है कि जैसे जोंक गाय के थन के पास चिपकी होती हैं, लेकिन दुर्भाग्य उसका कि गाय के थन के पास चिपकी रहने के बाद भी वह गाय के दूध का आस्वादन लेने की जगह खून ही पीती है। अगर उसके पास बुद्धि होती तो वह गाय का अमृतोपम दूध पी सकती थी, लेकिन वह सड़ा हुआ खून पी-पीकर अपनी ज़िन्दगी से हाथ धोने को मजबूर हो जाती है।