दिव्य विचार: अच्छे कार्य पूरे उत्साह के साथ करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि कोई अच्छा और बुरा भाव हम करते हैं, उसके प्रति हमारे मन में जितनी अधिक तीव्रता और मन्दता होती है उससे बँधने वाले कर्म उतने ही तीव्र और मन्द होते हैं। हम पूर्ण उत्साह के साथ यदि कोई कार्य करते हैं तो बँधने वाले कर्म उतने ही प्रगाढ़ होते हैं और यदि मन्द उत्साह के साथ करते हैं तो कर्म भी मन्द होता है। सन्त कहते हैं- अच्छा कार्य करना है तो पूरे उत्साह से करो और अगर बुरा कार्य करना हो तो उसे ऐसे करो जैसे करना पड़ रहा है। लेकिन आप लोग उल्टा करते हो। अच्छा कार्य तो मन मारकर करते हो और बुरा कार्य पूरा मन लगाकर करते हो। ज्ञानी की यही स्थिति होती है। वह संसार के जितने भी कार्य करता है, उन्हें मन मारकर करता है। करता नहीं है, करना पड़ता है। बस आपसे मैं इतना ही कहता हूँ कि आप जो कुछ भी करो, करो मत, बस करना पड़ रहा है, यह भाव रक्खो । बुरे कार्य करो मत, भले ही करना पड़ें। और अच्छे कार्य करना न पड़ें, करो। जीवन में बहुत कुछ उपलब्धि घटित हो जायेगी। परमानन्द की अनुभूति आपको होगी। वहीं से आपके जीवन का मंगलाचरण शुरू हो जायेगा। आप अपने आपको उस अनुरूप ढालने की कोशिश करो, लेकिन यह सब जब तक हमारे अन्दर की दृष्टि विकसित नहीं होती तब तक काम नहीं बनता है । सम्यग्दृष्टि की दृष्टि अलग प्रकार की होती है। उसकी चेतना ऊर्ध्वमुखी होती है और मिथ्यादृष्टि की जो चेतना होती है, वह अधोमुखी होती है। जिसकी चेतना अधोमुखी होती है, उसका पतन होता है। जिसकी चेतना ऊर्ध्वमुखी होती है, उसका उत्थान होता है। हम दोनों चरणों को देखते हैं। सांसारिक क्रियाओं को यदि हम ऊर्ध्वमुखी चेतना के साथ सम्पादित करें तो हमारा कुछ भी बिगाड़ नहीं होगा और अधोमुखी चेतना के साथ उनमें संलिप्त हो जायें तो हमारा बिगाड़ हुये बिना नहीं रहेगा।






