दिव्य विचार: विरक्त रहकर करो कोई भी कार्य- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि दो व्यक्ति काम कर रहे हैं, एक ही काम कर रहे हैं, लेकिन एक अन्दर से विरक्त होकर काम कर रहा है और दूसरा अन्दर से अनुरक्त होकर काम कर रहा है। जो अनुरक्त होकर काम करेगा वह बन्धन में बँधेगा, जो विरक्त होकर काम करेगा वह निर्बन्ध रहेगा। निर्बन्ध होकर जीना चाहते हो तो अपने आपको विरक्त करो। जैसे धाय बच्चे को खिलाती है, पालती-पोसती है। धाय का काम बच्चे का लालन-पालन करना होता है। धाय के ऊपर जिस बच्चे को पालने-पोसने का दायित्व होता है उसे पूरे मन से पालती-पोसती है। अपना दूध भी पिलाती है, खिलाती है, नहलाती है, सुलाती है, धुलाती है और कई बार तो उस बच्चे को भी यह भ्रम हो जाता है कि यह ही मेरी असली माँ हैं। लेकिन इसके बाद भी वह धाय जानती है कि कौन मेरा असली बेटा है। वह जानती है कि यह बेटा मेरा बेटा नहीं है। मैं तो सिर्फ पालन-पोषण कर रही हूँ। क्योंकि उसको पालना मेरा कर्तव्य है। पर बेटा मेरा नहीं है। यही तो अन्तर है एक ज्ञानी और अज्ञानी में । ज्ञानी संसार में रहता ज़रूर है पर कर्तृत्व की भावना से मुक्त होकर रहता है और अज्ञानी कर्ताबुद्धि बनाकर रहता है। एक संसार में मालिक की तरह जीता है और दूसरा मेहमान की तरह होता है। जो संसार का मालिक बनने की कोशिश करता है उसे फटेहाल रह जाना पड़ता है और जो मेहमान की तरह संसार में रहता है वह मालामाल बना रहता है। क्योंकि मेहमान की सदैव खातिर ही होती है। आपके घर में कोई दूसरा व्यक्ति घुस जाये और मालकियत का दावा ठोके तो आप उसे पीट-पीटकर घर से बाहर निकाल देंगे, लेकिन आपके घर में यदि कोई मेहमान आये तो जाते वक्त भी आप उसे टीका करोगे। मालिक मत बनो, मेहमान की भाँति रहो। यही ज्ञानी की पहचान है, मालामाल बने रहोगे और यदि मालकियत ठोकोगे तो तुम्हारी खैरियत नहीं है। मालकियत से अपने आपको बचाइये। सब कुछ करिये पर उससे अलिप्त रहिये। ठीक है मैं रह रहा हूँ, पर इसका कर्ता और स्वामी मैं नहीं हूँ। घर-परिवार चला रहा हूँ तो चलाने में निमित्त मात्र हूँ।






