दिव्य विचार: अकेले आए, अकेले ही जाओगे- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि संत कहते हैं - इस भ्रम को तोड़िए, इस भ्रम का निवारण कीजिए। सबके बीच रहते हुए भी स्वयं में रमे रहने की कला सीखिए। आया हूँ अकेला, अकेला ही जाऊँगा। मैं क्या ? सब अकेले आए हैं और अकेले ही जायेंगे। जिस क्षण यह प्रतीति होने लगेगी उसी क्षण तुम्हारे जीवन का क्रम परिवर्तित हो जाएगा। जैन पुराणों में एक बड़ी मार्मिक कहानी आती है। सम्राट श्रेणिक अपनी महारानी चेलना के साथ वन विहार को जा रहे थे। देखते क्या हैं, एक तरुण तपस्वी नग्न दिगम्बर मुद्रा को धारण किए तपस्या में लीन है। श्रेणिक उन मुनिराज की ऐसी सुन्दर काया को देखकर मुग्ध हो जाता है। देवों जैसे अप्रतिम सौन्दर्य के धनी उन मुनि को तपस्या की मुद्रा में देख श्रेणिक का चित्त मर्माहत हो उठा। वह सोच में पड़ गया कि ऐसा कौन सा देव कुमार अपनी स्वर्ग की कोमल शय्या को त्यागकर इस तपस्या के मार्ग को अंगीकार कर रहा है ? आखिर क्या कारण है ? उसे क्या कमी है, जो स्वर्ग के सुख-वैभव को त्यागकर अपनी सोने जैसी जवानी को मिट्टी में मिला रहा है। इसी चिन्तन के साथ आगे बढ़ते-बढ़ते वह उन मुनिराज के समीप पहुँचा, उनकी वन्दना की और पूछ बैठा कि प्रभो! आखिर आपको क्या कमी थी, जो आप अपनी इस कोमल-कुमारवय में इस कठोर साधना में उतर आये। तुम्हारी कोमल काया, सुन्दर देहयष्टि और यह यौवन तो भोगों को भोगने के लिए है। जंगलों के कंटकाकीर्ण मार्ग में चलने का कदम क्यों उठाया, आखिर क्या कारण था ? संत ने सहज भाव से कहा- राजन् ! मैं अनाथ था। मैने पाया कि संसार का कोई कितना बड़े से बड़ा आत्मीय क्यों न हो, कोई किसी का कितना बड़े से बड़ा प्रिय भी क्यों न हो, कभी भी किसी की पीड़ा नहीं हर सकता, किसी को साथ नहीं दे सकता। इसलिए मैने इस मार्ग को अपना लिया है।






