दिव्य विचार: राग द्वेष से परे है तुम्हारा स्वरूप- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि किसका पिता, कौन किसकी माता, कौन किसका भाई, कौन किसकी बहिन ? तात्त्विक दृष्टि से विचार करने की कोशिश करो। यह तो महज़ एक संयोग है। जब तक है, तब तक है। उनके बीच रहो जरूर, लेकिन रमो स्वयं में। ये परिजन बाहर के नहीं होना चाहिए। सच्चे अर्थों में यदि तुम अपने परिजनों से स्थायी सम्बन्ध / सम्पर्क रखना चाहते हो तो तुम्हें आत्मा के मुख्य धर्म - ज्ञान, दर्शन, सुख, आनन्द आदि परिजनों की ओर दृष्टिपात् करना होगा, जो तुम्हारे ही अन्दर रहते हैं। तुम्हारे भीतर का ज्ञान, तुम्हारे भीतर का दर्शन, तुम्हारे अन्दर का सुख, तुम्हारे अन्दर का आनन्द, यही तुम्हारे सच्चे परिजन हैं जो तुम्हारे आत्मगुण हैं। कभी भी नष्ट नहीं होने वाले । सदा से हैं और सदैव रहेंगे। न कभी उत्पन्न हुए हैं, न कभी विनष्ट होगे। उन्हें पहचानो। लेकिन यह विडम्बना है कि जो अपने परिजन हैं, सच्चे परिजन हैं उनको तो हम पहचानते ही नहीं। जो अपने नहीं हैं उनके पीछे रात-दिन पागल होते हैं। अन्यत्वभावना कहती है - तुम सबसे अलग हो। तुम्हारा इनसे कोई सम्बन्ध नहीं, कोई लेना-देना नहीं। तुम जो हो उसे पहचानने की कोशिश करो। तन नहीं, परिजन नहीं, धन नहीं, भोजन नहीं, वचन नहीं, कुछ भी तुम नहीं हो। फिर कौन हो ? कहते हैं -और आगे बढ़ो, शरीर तो तुम हो ही नहीं। तुम्हारे अन्दर जो विचार उत्पन्न हो रहे हैं, तुम्हारा मन वह भी तुम नहीं हो। तुम्हारे जो विचार हैं वे भी तुम नहीं। ये सभी विभाव हैं। कर्म के निमित्त से उत्पन्न होने वाले विभाव हैं। क्योंकि विचारों में एकरूपता नहीं रहती है। वे पल-पल परिवर्तित होते रहते हैं। तुम्हारे अन्दर जो राग है, द्वेष है, क्रोध है, मान है, माया है, लोभ है, मत्सर है, मोह है, मद है ये जितने भी विकार हैं, ये भी तुम नहीं हो और ये तुम्हारे नहीं हैं। यह तुम्हारा स्वभाव नहीं है। ये सब तुम्हारे भीतर के विकार हैं, जो कर्म के निमित्त से उत्पन्न होते हैं। तुम्हारा स्वरूप इन सबसे परे है। विकार में रहते हुए भी तुम स्वरूप से निर्विकार हो, उस निर्विकार को पहचानो।






