दिव्य विचार: तुम्हारे पूर्वजों का भी अस्तित्व है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: तुम्हारे पूर्वजों का भी अस्तित्व है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि दुनिया के किसी कोने में धरती और आसमान मिलकर एक नहीं हुए, लेकिन तुम छत पर खड़े होकर देखोगे तो एक होते दिखाई ज़रूर देते हैं। तुम्हारे बाप-दादा, तुम्हारे पूर्वज आज तुम्हें दिखाई नहीं पड़ते, लेकिन उनका अस्तित्व नकारा नहीं जा सकता। भले आज वे नहीं हैं, पर कभी तो रहे हैं। उनका अस्तित्व रहा है। वे थे तभी हम हैं। वे नहीं होते तो आज हम भी नहीं होते। मैं यह कह रहा था कि यह मानना कि जो सामने दिखता है वह है, इससे परे कुछ नहीं है, यह हमारे चिन्तन के एकांगीपन का परिणाम है। संत कहते हैं कि स्वर्ग और नरक का भी अस्तित्व है। जो इस अस्तित्व से परे है, उसे केवल विश्वास की आँखों से ही जाना जा सकता है। तर्क की आँखों से उन्हें पहचानना संभव नहीं है। ऐसा नरक है और उस नरक में मनुष्य के जीवन का बहुभाग बीता है। प्रत्येक प्राणी का बहुभाग नरक में बीता है। आखिर वह नरक है क्या ? नरक शब्द की व्याख्या करते हुए शास्त्रकार कहते हैं -

नरान् कायन्ति इति नरका:।

जिसका नाम सुनने से ही मनुष्य के मन में भय उत्पन्न हो जाए, उसका नाम नरक है। कितनी बार तुम्हें नरक जाना पड़ा, और उस नरक में क्या-क्या स्थिति बनी। यह मैं बताता हूँ आपको। नरक में हमारा क्या अनुभव होता है ? जैसे ही मैं अपनी दुष्कृतियों के परिणाम स्वरूप नरक में जन्मा, मेरा शरीर जन्म लेते ही काफी ऊँचाई से उछला और उछलते ही जब नीचे गिरा तो छत्तीस प्रकार के तीक्ष्ण आयुधों पर गिरकर हमारा शरीर क्षत-विक्षत हो गया। शरीर न जाने कितने खण्डों में विभक्त हो गया। बड़ी मर्मान्तक पीड़ा हुई, कराह उत्पन्न हुई। नरक के शरीर की विशेषता है कि वह वैक्रियिक होने से बिखरने के बाद भी ज्यों का त्यों हो जाता है। उठकर खड़ा भी नहीं हो पाया कि वहाँ पहले से तैयार नारकी ऊपर से हमला बोल बैठते हैं। मैं घबड़ाकर इधर-उधर दौड़ा। भयंकर वेदना हुई वहाँ की भूमि के स्पर्श मात्र से। ऐसी वेदना हुई कि मानो एक साथ हजारों बिच्छुओं ने काट खाया हो । वहाँ की भूमि के स्पर्श मात्र की वेदना और पीछे से नारकियों का वार ।