दिव्य विचार: प्रसन्नता का आधार प्रेम है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि ध्यान रखना, प्रेम में लेने-देने की बात नहीं होती है। प्रेम में तो केवल अर्पित हो जाने की बात होती है। एक बार हो गया सो हो गया। जहाँ लेन-देन की बात है वहाँ प्रेम सौदा है। जहाँ हार-जीत की बात है वहाँ प्रेम खेल है और मैं कहना चाहता हूँ कि प्रेम न तो खेल है और न ही सौदा है। प्रेम अन्दर की सात्विक अनुभूति है, जो सम्यक्त्व के परिणाम से अभिव्यक्त होती है। वह तुम्हारे भीतर प्रकट हो गई तो ज़्यादा कुछ करने और कहने की ज़रूरत नहीं होती है। व्यक्ति के लिये, समाज के लिये, परिवार के लिये हर भूमिका में प्रेम की आवश्यकता है। जो व्यक्ति इस प्रेम की भूमिका में जीता है उसके जीवन का रस कुछ और होता है। इसलिये आप अपने अन्तरंग को टटोलकर देखिये कि आपके भीतर विस्तार किसको मिल रहा है? प्रेम को मिल रहा है या घृणा को? वात्सल्य को मिल रहा है या वैमनस्य को ? आप देखिये कि यदि आपके भीतर आत्मीयता बढ़ रही है तो तय मानकर चलना कि हम सही दिशा में चल रहे हैं। तुम्हारे भीतर का वात्सल्य विस्तार पा रहा है तो तय मानना कि तुम्हारे जीवन की दिशा सही है, लेकिन यदि इसके विपरीत चल रहे हो तो भले तुम दुनिया में कितने भी बड़े और सफल क्यों न माने जाओ, परमार्थ के क्षेत्र में अभी बहुत ज्यादा विफल हो । ध्यान रखना, प्रेमशून्य व्यक्ति न केवल परमार्थ में विफल होता है अपितु व्यवहार में भी विफल हो जाता है क्योंकि उस व्यक्ति को कोई भी पूछता नहीं। उस व्यक्ति को कहीं भी सम्मान नहीं मिलता है। उस व्यक्ति को कहीं सत्कार नहीं मिलता है। सम्मान, सत्कार के अभाव में मनुष्य के मन में कहीं भी प्रसन्नता नहीं होती है। प्रसन्नता के अभाव में जीना, नहीं जीने के जैसा ही है। जिस व्यक्ति के चित्त में आनन्द नहीं वह जीते जी ही मुर्दा के समान है। वस्तुतः जीवन का सच्चा रस तो इसी में है कि हम अपने-आपको प्रसन्नता से भरें और इस प्रसन्नता का आधार तो प्रेम है। प्रेम अपनायें और प्रेम बाँटें। जिस प्रकार फूल से खुशबू अपने आप निकलना प्रारम्भ हो जाती है उसी प्रकार जिस व्यक्ति के मन में प्रेम होता है उसके अन्तरंग से वात्सल्य अपने आप ही प्रकट हो जाता है।






