दिव्य विचार: प्रेम शून्य व्यक्ति धार्मिक नहीं हो सकता- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: प्रेम शून्य व्यक्ति धार्मिक नहीं हो सकता- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि उस प्रेम को अपने हृदय में विकसित करते हुये, प्रेम का पाठ पढ़ाते हुये आचार्य समन्तभद्र महाराज ने कहा है- 

स्वयूथ्यान् प्रति सद्भावसनाथापे तकै तवा । प्रतिपत्तिर्यथायोग्यं वात्सल्यमभिलप्यते।

अपने साधर्मियों के प्रति अपने आचार-विचार से मेल रखने वालों के प्रति बिना किसी स्वार्थ और छल के प्रेम रखना, उनका यथायोग्य आदर-सत्कार और सम्मान करना, उनके प्रति आन्तरिक स्नेह रखना, ये सम्यग्दर्शन का सातवाँ अंग वात्सल्य है जिसे हृदय का प्रतीक माना गया है। यह सम्यक्त्व का हृदय है। कदाचित् आदमी का मस्तिष्क काम न करे, तो भी वह जी सकता है लेकिन हृदयगति रुक जाये तो वह जी नहीं सकता है। सम्यग्दर्शन के अन्य अंगों में कदाचित् कमी हो जाये तो कोई बात नहीं बिगड़ती है, लेकिन यदि वात्सल्य खत्म हो जाये तो सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। जैसे अस्थि हीन कीड़े को सूर्य अपने तेज से नष्ट कर देता है। ऐसे ही प्रेम शून्य पुरुष को धर्म भी अपने तेज से नष्ट कर देता है। वस्तुत-हमारे अन्तरंग में प्रेम है तो हमें सर्वत्र सफलता मिलती है। यदि इसका अभाव है तो सब कुछ खत्म है। बन्धुओं, उसी मनुष्य के हृदय को हृदय कहा जाता है जिसके अन्दर प्यार हो। प्यार ही हमारे जीवन की पतवार है, इसके बल पर ही हम भवसागर से पार उतर सकते हैं। इसलिये प्रेम की भावना हमारे अन्तरंग में विकसित होनी चाहिये। जैसे मरुस्थल के सूखे ठूठ में कोई कोपल नहीं उगती है वैसे ही प्रेमशून्य मनुष्य के हृदय में धर्म की कोपल नहीं खिलती है। प्रेम हमारे जीवन में माधुर्य का रस घोलता है। यह हमारा आन्तरिक सौन्दर्य है। मनुष्य ऊपर से चाहे कितना भी टिपटॉप क्यों न हो, पर उसका व्यवहार यदि प्रेमशून्य है तो उसका कोई मतलब नहीं है। ऊपर सुन्दर दिखने वाला व्यक्ति यदि असुन्दर व्यवहार करता है तो वह व्यक्ति लोक में कहीं भी सम्मान पाने का अधिकारी नहीं होता है और यदि कदाचित् सौन्दर्य में कमजोर है लेकिन उसका व्यवहार सुन्दर है तो सर्वत्र पूजा-सम्मान और आदर का पात्र बनता है।