दिव्य विचार: हृदय में निश्छलता लाओ- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: हृदय में निश्छलता लाओ- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि प्रेम हमारे व्यवहार को सुन्दर बनाने वाला तत्त्व है। वह तत्त्व हमारे भीतर विकसित होना चाहिये। जिस मनुष्य के अन्तर में प्रेम पलता है, उस मनुष्य को कहीं भी तकलीफ नहीं होती है और जिस मनुष्य का चित्त प्रेमशून्य होता है, वह कहीं भी शान्ति नहीं पा सकता है। इसलिये अपने हृदय को प्रेम से भरने की हमारी चेष्टा निरन्तर बननी चाहिये, जिससे हम एक दूसरे के पूरक बनकर आगे चल सकें। बन्धुओं, प्रेम / वात्सल्य एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। वात्सल्य शब्द वत्स शब्द से बना है। वत्स का अर्थ होता है बछड़ा। गाय अपने बछड़े के प्रति कितना ज़्यादा प्रेम रखती है। बछड़े को देखते ही गाय का रोम-रोम पुलकित हो उठता है। ऐसे ही धर्मात्मा व्यक्ति के जीवन में होता है, वह जब अपने समान किसी धर्मात्मा को देखता है तो उसके हृदय में प्रेम उमड़ पड़ता है। उसके रोम-रोम में प्रेम की पुलकन हो उठती है। हम अपने मतलब से चाहे जिसके प्रति प्रेम रख लेते हैं पर ध्यान रखना स्वार्थ से प्रेरित होकर प्रकट किया जाने वाला प्रेम, प्रेम नहीं केवल प्रेम का अभिनय है और बिना स्वार्थ के दूसरे के प्रति होने वाला प्रेम ही प्रेम का अनुभव होता है। सन्त कहते हैं कि प्रेम का अभिनय तो हर कोई कर लेता है, पर प्रेम का अनुभव वही करता है जिसके हृदय में निश्छलता होती है। जो सच्चे अर्थों में धर्म को आत्मसात करके चलता है। उसका जीवन निश्चित रूप से महान बनता है। हम देखें कि हम कर क्या रहे हैं ? हम प्रेम की बात कर रहे हैं, वह प्रेम हमारे अन्दर है भी या नहीं ? ऐसा तो नहीं, कि हम जिसे प्रेम मानकर चल रहे हैं, वह प्रेम के नाम पर केवल फेम बनकर रह गया हो । सन्त कहते हैं कि प्रेम को, प्रेम का फेम मत बनाओ। प्रेम तो त्याग सिखाता है। प्रेम सर्वस्व नष्ट कर देने के बाद भी प्रसन्न रहने की बात सिखाता है। जिस मनुष्य के मन में प्रेम होता है उसके सम्बन्ध कहीं नहीं बिगड़ते और जिसके अन्तरंग में प्रेम नहीं होता है उसके सम्पर्क कहीं भी बनते नहीं हैं। प्रेम हमारे सम्बन्धों को बनाता है और प्रेमशून्यता हमारे सम्बन्धों को मिटा डालती है।