दिव्य विचार: देह को नहीं, अंदर के देही को देखो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि यह जो हमारा शरीर है वह स्वभाव से अशुचि का पिण्ड है। इस अशुचि के भण्डार स्वरूप शरीर को देखकर / शरीर के ग्लानिजनक रूप को देखकर मन में घृणा और ग्लानि का भाव न लाकर उनके गुणों के प्रति आदर का भाव रखना निर्विचिकित्सा अंग है। तय है शरीर चाहे किसी का भी क्यों न हो, यह अशुचिता का पिण्ड है। इस शरीर का निर्माण ही तमाम प्रकार के अपवित्र द्रव्यों के मेल से हुआ है। अगर हम किसी भी प्रकार की शारीरिक अशुचिता को देखकर मन में ग्लानि का भाव रखते हैं तो यह हमारी बहुत बड़ी दुर्बलता है। सन्त कहते हैं - देह को नहीं, अन्दर के देही को देखो। शरीर को नहीं, भीतर बैठे शरीरी को पहचानने की कोशिश करो। सम्यग्दृष्टि की दृष्टि शरीर पर नहीं, भीतर बैठे शरीरी पर होती है। वह हमेशा चर्म को नहीं मर्म को महत्त्व देता है। वह मानता है कि भले ही शरीर किसी का ऊपर से सुन्दर-असुन्दर हो सकता है, रूपवान- विद्रूप हो सकता है, अच्छा और बुरा हो सकता है अथवा शरीर में ग्लानि जनक रूप में दिखाई पड़ सकता है, लेकिन आत्मा सबकी एक है, सुन्दर है, श्रेष्ठ है और सौम्य है। आत्मसत्ता के हिसाब से किसी में किसी भी प्रकार का अन्तर नहीं है। शरीर अलग-अलग है, लेकिन आत्मा सबकी एक है। सम्यग्दृष्टि की दृष्टि आत्मा पर केन्द्रित होती है। आत्मगुणों की दृष्टि से देखा जाये तो प्रत्येक आत्मा में बिल्कुल भी भिन्नता नहीं है। हम सबकी आत्मा उस शुद्धात्मा की तरह है जिन्हें हम सिद्ध कहते हैं। तत्त्वतः उनमें और हममें कोई अन्तर नहीं है। सबके भीतर का जो ऐश्वर्य है वह समान है। सबकी आत्मा की जो शक्तियाँ हैं वे समान हैं। उसमें किंचित् भी असमानता नहीं है। किंचित् भी विरूपता नहीं है। जहाँ एकरूपता का अहसास होता है, वहाँ समता का भाव होता है और जहां समता का भाव होता है वहां शांति का अविर्भाव होता है। सम्यक्त्वी इसी आत्मसौम्य की मनोभूमिका में जीता है। इसलिए वह देह को गौण करके भीतर के विदेही तत्व पर अपनी दृष्टि केन्द्रित करता है।






