दिव्य विचार: साधना का मार्ग होता है कठिन- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: साधना का मार्ग होता है कठिन- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि मोक्षमार्ग साधना का मार्ग है और साधना का मार्ग बड़ा कठिन होता है। एक संसार का मार्ग है और दूसरा साधना का मार्ग है। संसार का मार्ग चलने में सरल है पर पहुँचाता कहीं भी नहीं है और जो साधना का मार्ग है वह दिखने में कठिन है पर हमें हमारे मन्तव्य तक पहुँचा देता है। एक मार्ग है जिसे हम श्रेय का मार्ग कह सकते हैं और दूसरा मार्ग है जिसे हम प्रिय कह सकते हैं। जो प्रिय है वह वेश्वार का मार्ग है। इस मार्ग में बहुत सहूलियतें हैं, लेकिन इसकी कोई मंजिल नहीं है। पर वह मार्ग जिसमें हमारा श्रेय है, कल्याण है, वह दिखने में कठिन जरूर है पर हमें हमारे लक्ष्य तक पहुँचा सकता है। इस मार्ग का अनुकरण कर हम अपने गन्तव्य तक पहुँच सकते हैं। यह ऐसा ही है जैसे कि एक रेत का टीला हो और उस पर चढ़ना हो तो उसका स्पर्श बड़ा मुलायम-सा महसूस होता है। रेत के टीले पर जैसे ही आदमी चढ़ता है, वापस उत्तर आता है क्योंकि रेत भसकती है। रेत के भसकने से आदमी नीचे आ जाता है और जो दूसरा मार्ग है वह पहाड़ी चट्टानों का मार्ग है। जिसमें एक-एक कदम हमें सम्हल - सम्हल कर रखना पड़ता है, लेकिन आदमी सम्हल- सम्हल कर चले तो ऊपर पहुँचने के बाद वह प्रकृति की रमणीय छटा के दर्शन भी कर सकता है। यह मार्ग है मोक्ष का मार्ग । जो शुरूआत में कठिन जरूर दिखता है, पर सम्हाल - सम्हाल कर चलने की आवश्यकता है, क्योंकि कदम-कदम पर दुर्घटनाओं की सम्भावनायें हैं। दुर्घटना की जहाँ भी सम्भावना बनी है, वहाँ सम्हलकर चलना प्रत्येक साधक का कर्तव्य है। सन्त कहते हैं कि खुद से सम्हालो और सम्हलते सम्हलते तुम भी आगे बढ़ते रहो। अन्य कोई तुम्हें फिसलता दिखे तो उसे भी सहारा दो। गिरते को सहारा देने का नाम ही स्थितीकरण अंग है। सन्त कहते हैं कि पहले स्वयं को स्थिर करो और स्वयं की स्थिरता के साथ यदि कहीं किसी का किंचित स्खलन दिख रहा है तो उसे सहारा दो। यही तुम्हारा धर्म है, आध्यात्मिक सन्दर्भ में भी और व्यावहारिक सन्दर्भ में भी।