दिव्य विचार: सहनशीलता को बढ़ाओ- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि जीवन का यह दृश्य, जगत का एक गहरा सपना है। जब तक नींद भरी है आँखों में, तब तक जगत का यह दृश्य अपना लगता है। किन्तु जितनी उम्र बाकी है, उतनी देर जागकर जी लो। कोई किसी का नहीं, सारी यात्रा एकाकी है, इसको समझ लो। अपनी आँखें खोलो और इस एकाकीपन की अनिवार्यता को समझो तब हमारे जीवन का दुःख स्वयमेव दूर हो जाएगा। लेकिन आप अपने मन को टटोलकर देखना, व्यक्ति का मन कितना परमुखापेक्षी है। हम हर चीज में, हर काम में परावलम्बी बनने के आदी हैं। एक आदमी यदि बीमार है, तो वह चाहता है कि घर के सारे लोग उसकी सेवा में लगे रहें। एक आदमी बीमार होता है और वह परमुखापेक्षी है तो अपनी प्रवृत्ति से सारे घर को बीमार कर देता है। सारा घर डिस्टर्ब हो जाता है। भाई ! थोड़ी समझदारी से काम लो। विचार करो, कि इस कदर सारा घर तुम्हें घेरे ही बैठा रहेगा तो घर का काम अवश्य डिस्टर्ब होगा। तुम्हारी पीड़ा को कोई नहीं हर सकता। ऐसी स्थिति में परनिर्भरता बढ़ाने की अपेक्षा अपनी सहनशीलता को बढ़ाना चाहिए। यह धारणा बनाना चाहिए कि यह मेरे अन्दर की पीड़ा है, मेरे कारण उत्पन्न हुई पीड़ा है, मेरे कर्मों का फल है। मुझे ही खुद भोगना है। बाहर के लोग चिकित्सा की व्यवस्था कर सकते हैं, डॉक्टर, वैद्य, हकीम की व्यवस्था कर सकते हैं, किन्तु वे मेरी पीड़ा को हर नहीं सकते। मेरी पीड़ा तो केवल मेरी परिणति ही हरेगी। उस समय यदि एकत्वभावना से भर जायें तो तन भले बीमार रहे पर मन कभी बीमार नहीं हो सकता। ध्यान रखना बन्धुओ ! तन की बीमारी का तो इलाज है, पर मन की बीमारी का कोई इलाज नहीं है। जो आध्यात्मिकता से शून्य होते हैं, वे तन से कम बीमार होते हैं और मन से ज्यादा बीमार होते हैं। मन की बीमारी बड़ी खतरनाक है। अध्यात्म हमें इसी मन की बीमारी को दूर करने का संदेश देता है। उस समय आप समझिए, मुझे अप्पदीवो भव बनना है। मुझे स्वयं अपने पथ का प्रकाशक बनना है।






