दिव्य विचार: अहंकार से सरलता नष्ट होती है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि पहली बात तो यह है कि हम देहदृष्टि न रख करके आत्मदृष्टि रखें। किसी के शरीर की अशुचिता और अपवित्रता का उपहास न करें। जहाँ तक हो सके तो उनकी सेवा करके अपने जीवन को धन्य करने की कोशिश करें। यह निर्विचिकित्सा अंग का व्यावहारिक रूप है। सेवा-सुश्रुषा के क्षेत्र में हम आगे आयें। हमारे घर में यदि किसी को सेवा की आवश्यकता है तो नर्सों तो हम लगा देते हैं, पर हमारे पास सेवा करने का समय नहीं है। अरे, जिसने तुम्हारा मलमूत्र साफ किया, जिसने तुम्हें नौ माह तक अपने गर्भ में धारण किया, उस माँ की सेवा करने के लिये यदि तुम्हें नर्से लगानी पड़ रही है तो यह तुम्हारे लिये नालायकी जैसी बात है। उनकी सेवा करके उनके सारे ऋणों से निवृत्त होने का भाव रखना चाहिये। हम उनकी सेवा करें। घर में सेवा करेंगे तो बाहर भी हमारी सेवा करने की मनोवृत्ति होगी और हम अपने जीवन को धन्य करने में सफल होंगे। दूसरी बात, हम गुणधारकों के गुणों का आदर करना शुरू करें। कभी किसी की आलोचना हम खुले तौर पर न करें। जहाँ तक बन सके सबके अच्छे की बात हम करें। हम यह कोशिश करें कि किसी से हमारे विद्वेष सम्बन्ध बनते हैं तो वह हमारे जीवन के लिये काँटा बनता है और यदि किसी एक से भी हम प्रेम पूर्ण सम्बन्ध बनाते हैं तो हमारे लिये एक फूल बनता है। बन्धुओं, आज तक हमारा जीवन कंटकादि मय रहा है, अब हम उसे पुष्पित करने का प्रयास करें। सब चीजें हमारे हाथ में हैं। बस थोड़ा-सा हम अपने अभिमान को गौण कर दें। वस्तुतः मन में तो ये बातें आती हैं, पर जब हमारे अन्दर का अहं आड़े आ जाता है तब भीतर की सरलता नष्ट हो जाती है, सात्त्विकता समाप्त हो जाती है। वह हमारी सोच को ही बदल देता है। ऐसा करूँगा तो कैसा होगा, और ऐसा करूँगा तो कैसा होगा ? यह दुर्बलतायें हैं, जिनके शिकार हम अनन्त जन्मों से बनते आये हैं। इन दुर्बलताओं को हम दूर करें, और यह हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।






