दिव्य विचार: धर्म वही जो आत्म मलीनता को दूर करे- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: धर्म वही जो आत्म मलीनता को दूर करे- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि सम्यग्दर्शन की उपलब्धि का मतलब है ज्ञान सम्पन्न दृष्टि की उपलब्धि होना। सम्यग्दृष्टि जीवन की वास्तविकता को भली-भाँति जानता है। उसके पास सही समझ और सही दृष्टि विकसित हो जाती है और यही कारण है कि अपने जीवन व्यवहार में वह बहुत साफ-सुथरी प्रवृत्ति को अपनाता है। वह सब प्रकार की आध्यात्मिक बुराइयों और दुर्बलताओं से मुक्ति के अभियान में जुटा होता है। धर्म के सन्दर्भ में उसकी समझ स्पष्ट होती है। धर्म के रूप में वह केवल उन्हीं बातों को स्थान देता है, जिनका आत्महित से सम्बन्ध हो। वह उन तमाम बातों से दूर रहता है, जो आत्महित में बाधक हों। वह स्पष्ट जानता है कि धर्म वही है जो हमारी आत्म- मलीनता को दूर करे। जिन क्रियाओं और प्रवृत्तियों में आत्मा का कोई शोधन न हो उनसे वह कोई मतलब नहीं रखता है। उसकी पूजा-आराधना भी वहीं तक सीमित रहती है जो उसकी आत्मशुद्धि में सहायक हो। जो उसके विचारों को निर्मल बनाने में सहायक हो। जो उसके मन को पवित्र बनाने में सहायक हो । वस्तुतः वही धर्म के रूप में स्वीकारने योग्य है, जिन बातों का आत्मा की शुद्धि से कोई सम्बन्ध हो । उन सब बातों को धर्म के क्षेत्र में अपनाने की कोई आवश्यकता नहीं, जिनका आत्मशुद्धि से कोई सम्बन्ध नहीं है। इसलिये वह एकदम साफ-सुथरी दृष्टि रखता है। वह उन तमाम बातों को मूढ़ता के रूप में स्वीकार करता है, जिनका धर्म के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता है। इसीलिये उसको अमूढदृष्टि कहते हैं। यह सम्यग्दर्शन का चौथा अंग है। अमूढदृष्टि का मतलब है अपनी दृष्टि को कहीं से भी मूढ़ नहीं होने देना । सम्यग्दृष्टि अपनी अविचल दृष्टि रखता है। वह कभी किसी के प्रभाव में नहीं आता है। वह अपनी आत्मा से प्रभावित होता है। वह अपने प्रभु से प्रभावित होता है और उसकी आत्मा और प्रभु के अलावा संसार में उसको प्रभावित करने में कोई सफल नहीं हो पाता है। यही उसकी अमूढ़दृष्टिता है।