दिव्य विचार: बेहतर परिणाम के लिए नकारात्मकता छोड़ें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: बेहतर परिणाम के लिए नकारात्मकता छोड़ें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि अच्छा करने की सीख देने वाले व्यक्ति के लिये कभी भी कोई विरोधी खड़े नहीं होते। लेकिन हम लोग अच्छे को अच्छा कहने में बहुत सकुचाते हैं। बुरे को बुरा तो हम बहुत तेजी से कह देते हैं लेकिन अच्छे को अच्छा कहने के अभ्यासी नहीं बन पाते हैं। सम्यग्दृष्टि वही है जो अच्छे को अच्छा कहने में संकोच नहीं करता है। हम अच्छे को अच्छा कहने का अभ्यास बनायें। देखिये जीवन में कैसे आनन्द के पुष्प खिलते हैं। सम्यग्दर्शन के निर्विचिकित्सा अंग का यही लक्षण है। अपने नज़रिये को बदलिये। नकारात्मक सोच से अपने आपको बचाइये । वस्तु और व्यक्ति के प्रति जब तक हमारे अन्दर नकारात्मकता भरी रहती है तब तक हम कभी अच्छे परिणाम नहीं पा सकते हैं। अच्छे परिणाम पाने के लिये अच्छी सोच रखना ज़रूरी है और अच्छी सोच की अभिव्यक्ति ही सम्यक्त्व की निर्मल परिणति है। हम गुणीजनों के प्रति प्रेम करें, पर उसकी जगह द्वेष करते हैं। लेकिन कितना प्रेम उमड़ता है यह तो भगवान ही जानता है। यदि प्रेम उमड़ रहा है तो तुम्हारे अन्दर के गुण विकसित हो रहे हैं और घृणा उमड़ रही है तो तुम्हारे गुण नष्ट हो रहे हैं।

"निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटी छबाय"

घृणा, विद्वेष, ईष्या भी लोग किससे करते हैं? कभी आपने सुना कि किसी गुण्डे या बदमाश के प्रति ईर्ष्या हो रही हो ? किसी अपराधी के प्रति ईर्ष्या हो रही हो ? कभी सुना है कि किसी वेश्या से किसी को ईष्या हो रही हो। नहीं सुना होगा। चोर, आतंकी, गुण्डा, बदमाश और वेश्या के प्रति किसी के मन में ईर्ष्या नहीं होती है। ईर्ष्या होगी किससे ? किसी साधु-परमात्मा से होगी। आपके अपने किसी भाई-बन्धु से होगी या किसी सती से होगी। अच्छे लोगों से ईर्ष्या होती है। बुरे लोगों से ईर्ष्या नहीं होती। अरे, अच्छे से अनुराग करना चाहिये और बुरे से दूरी बनाकर रखना चाहिये। हम लोग उल्टा कर देते हैं। इसलिये मैं अक्सर कहा करता हूँ कि यदि तुम्हारा नया ईष्यालु पैदा हुआ हो तो थोड़ा अपने अन्दर झाँक लेना जरूर तुम्हारे अन्दर कोई नया गुण प्रकट हुआ होगा । अपने गुणों को प्रोत्साहित कीजिये।