दिव्य विचार: समाज हित में स्वार्थो को दरकिनार करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि हम किसी को उँगली दिखाते हैं तो सामने वाला हो सकता है कि उस उँगली को तोड़कर के अलग कर दे, लेकिन यदि सब उँगलियाँ बाँध करके मुट्ठी के रूप में हों तो उस मुट्ठी से लोहा लेना सबके वश की बात नहीं होती है। संत कहते हैं- अपनी मुट्ठी बंद होनी चाहिये। हम उँगली की प्रवृत्ति को बन्द करें। मुट्ठी की प्रवृत्ति को अपनायें। समाज की मुट्ठी तभी बन्द रहेगी जब सभी उँगलियाँ एक साथ होंगी। मैं जानता हूँ हाथ में पाँच अँगुलियाँ हैं, पांचों अँगुलियाँ समान नहीं हैं। पर हमारे लिये तो समान रूप से काम करती हैं। हम एक अँगुली से रोटी नहीं खा सकते हैं। रोटी तो तभी खायेंगे जब पाँचों अँगुलियाँ साथ देंगी। अलग-अलग रह करके भी हमारे बीच आन्तरिक सामंजस्य होना चाहिये यह तभी संभव होगा जब हम अपने क्षुद्र स्वार्थो को दरकिनार करके चलेंगे। जब व्यक्ति अपने स्वार्थों के लिये समाज के व्यापक हित की उपेक्षा करना शुरू कर देता है तो वहीं समाज में विघटन की शुरूआत होनी प्रारम्भ हो जाती है। जो समाज के लिये अभिशाप बन जाती है। "जो बोता है बीज फूट के, प्रथम नष्ट वह ही होता" सन्त कहते हैं- ऐसा करने वाले व्यक्ति अपने साथ बहुत बड़ा धोखा कर रहे हैं। जो लोग समाज में फूट का बीज बोते हैं वे अपने आपको बर्बाद कर डालते हैं। बन्धुओं, बौद्धों के एक महान् ग्रन्थ महावक्र में एक बहुत अच्छी बात लिखी है, जो आज के सन्दर्भ में प्रेरक है। उसमें बुद्ध कहते हैं भिक्षुओं, तुम फूट डालने से बचना। और सब पापों को तो माफ किया जा सकता है, पर फूट डालने की वृत्ति को कभी भी माफ नहीं किया जा सकता है, क्योंकि फूट एक संक्रामक रोग है। एक बार फैलता है तो फैलता ही जाता है। हर व्यक्ति के सुंदर जीवन को असुंदर बना देता है। इसलिए इस फूट की बीमारी से अपने आपको बचाने की हमारी निरंतर कोशिश बनी रहनी चाहिए।






