दिव्य विचार: शक्ति और वैभव का सदुपयोग करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: शक्ति और वैभव का सदुपयोग करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि शास्त्रों में दो प्रकार का पुण्य कहा गया है, ध्यान से सुनना, क्योंकि बहुत बार लोग सोचते है कि मैं बहुत बड़ी उपलब्धि कर रहा हूँ, पर वही उनकी नैया को डुबो देता हैं। दो तरह का पुण्य है-1. पुण्यानुबन्धी और 2. पापानुबन्धी पुण्य। पुण्यानुबन्धी पुण्य वह होता है जो अपने उदय में व्यक्ति की बुद्धि को निर्मल बनाए. रखता है। उसे धर्म में अनुरक्त रखता है। नए पुण्य का बन्ध कराके मोक्ष का अधिकारी बनाता है। पापानुबन्धी पुण्य वैसा पुण्य होता है जो अपने उदय में आने पर व्यक्ति की बुद्धि को विकृत बना देता है, उसे पाप में अनुरक्त कर दुर्गति का पात्र बना देता है। सद्दाम हुसैन, ओसामा बिन लादेन जैसे लोगों का पुण्य पापानुबन्धी पुण्य है, जो पुण्य के प्रताप से वैभव तो पा गये, लेकिन उसके दुरुपयोग के कारण उनकी दुर्गति किसी से छुपी नहीं है। यदि इतनी शक्ति, क्षमता, सत्ता पाकर उसका सदुपयोग करते तो वे आज जन-जन के आदर्श बन गये होते। लेकिन पापानुबन्धी पुण्य कभी बुद्धि को व्यवस्थित नहीं होने देता। यह कैसे बंधता है ? विशुद्ध भावों से जो धर्माचरण करता है, उससे बंधने वाला पुण्य, पुण्यानुबन्धी पुण्य होता है। और मानकषाय के साथ धर्माचरण करने से पापानुबन्धी पुण्य का बन्ध होता है। क्या चाहते हो तुम ? कौन-सा पुण्य चाहते हो ? विचार करो। बड़ी विडम्बना है। आजकल के लोगों को धर्म-कर्म में ज्यादा रुचि नहीं है, शास्त्रों के प्रति लगाव है ही नहीं, केवल उथले स्तर पर जुड़ जाते हैं और उथले स्तर का जुड़ाव कभी-कभी उनके लिए हानिकारक बन जाता है। इसलिए संत कहते हैं आप पापभीरु बनो । उसके स्वरूप को समझो। उसी के अनुरूप अपना जीवन आगे बढ़ाओ। तब ही तुम्हारा उद्धार होगा। नहीं तो कहीं भी तुम्हारा भटकाव हो सकता है। इसलिए स्वयं के कल्याण के लिए सम्हलना बहुत ज़रूरी है। सच्चे धर्म को प्राप्त करना है तो उत्तम क्षमा को प्राप्त करना होगा। दशलक्षण धर्म को प्राप्त करना होगा। धर्म तो एक ही है, उसके लक्षण दश हैं। ये दशलक्षण धर्म हमारी आत्मा में विलक्षण गुणों का आविर्भाव करते हैं।