दिव्य विचार: धर्म का आचरण भी तो करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: धर्म का आचरण भी तो करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि नाव के गीत गाने वाले कभी अपनी नैया पार नहीं लगाते, पार नहीं उतरते। पार केवल वे ही उतरते हैं, जो नाव पर सवार होते हैं और पतवार चलाते हैं। संत कहते हैं - केवल धर्म का गुणगान करने मात्र से हमारा कल्याण नहीं होगा। कल्याण तब होगा जब तुम धर्म का आचरण करो। धर्म वह नाव है जिस पर यदि एक बार तुम सवार हो गए और साधना की पतवार चलाने लगे तो तुम्हें भवसागर से पार उतरने में देर नहीं लगेगी। हमारा जीन्नन हमें यह बताता है कि हमने ब कुछ किया पर धर्म की साधना नहीं की। धर्म की आराधना नहीं की। यदि धर्म की ठीक रीति से हमने आराधना की होती तो आज हम संसार में अटके नहीं होते। हमारा स्थान भी उन महान् आत्माओं की जगह होता, जिन्हें हम सिद्ध कहते हैं, परमात्मा कहते हैं। हम भी अपने जीवन का उद्धार कर लिए होते, लेकिन हमसे एक चूक हुई, हमारी एक बहुत बड़ी कमी रह गई कि हमने धर्म को समझा भले, स्वीकारा नहीं । धर्म भावना कहती है कि अपने मन को धर्म में इस तरह से रचा- पचा लो कि धर्म के लिए कुछ कहने की ज़रूरत नहीं हो। न केवल तुम धर्म को समझो, अपितु धर्म को जीवन में इस कदर उतारो कि उसका भाव तुम्हारे प्रत्येक विचार और व्यवहार में परिलक्षित हो। तुम्हारे प्रत्येक आचरण में धर्म का प्रतिबिम्ब दिखे। यदि व्यक्ति के भीतर धर्म हो तो यह सब बातें अपने आप आने लगती हैं। जो व्यक्ति धर्म से जुड़ा नहीं होता वह केवल बातें ही करता रहता है। मैं समझता कि आज व्यक्ति धर्म की बात ज़रूर करते हैं, लेकिन उनका धर्म से जो सम्बन्ध है वह बड़ा सतही स्तर का है। धर्म के प्रति जैसा आन्तरिक लगाव होना चाहिए वैसा नहीं है। सतही स्तर पर किया गया धर्म का आचरण कभी कल्याण नहीं कर सकता। वही धर्म हमारी आत्मा का उद्धारक बनता है।