दिव्य विचार: धर्म ही जीवन का उद्धार कर सकता है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि धर्म हमारे जीवन को सुरक्षा और संरक्षण प्रदान करने वाला तत्व है। धर्म के माध्यम से ही मैं अपने जीवन का उद्धार कर सकता हूँ। धर्म ही वह माध्यम है जो हमें सारे संकटों से मुक्त करा सकता है। धर्म ही वह साधना है, जिसके माध्यम से हम भवसागर से पार उतर सकते हैं। इसके अलावा और कोई दूसरा माध्यम नहीं है। इस तरह की भावनाओं को अपने हृदय में भर लेना ही धर्मभावना का मूल ध्येय है। अनित्यभावना से लेकर बोधिदुर्लभ भावना तक मैंने जिन-जिन बातों का विचार किया है, उन सबका केन्द्रबिन्दु यही है कि जीवन का कल्याण करना चाहते हो तो धर्म के माध्यम से ही करो। मैंने कहा धर्म ग्यारह भावनाओं का फल है। अन्य भावनाओं और धर्मभावना में अन्तर मैं कुछ इस प्रकार से करता हूँ- अन्य भावनाओं और धर्म भावना के मध्य फूल और फल जैसा सम्बन्ध है। फूल आते हैं तब फल लगता है। बिना फूल के कभी फल नहीं लगता, लेकिन जितने फूल होते हैं वे सब फल के रूप में परिवर्तित नहीं होते। कुछ ही फूल फल के रूप में परिवर्तित होते हैं। बाकी तो ऐसे ही झड़ जाते हैं। कहा जाता है कि आम में जितने मौर आते हैं, यदि वे सब फल जाएँ तो पेड़ उसका भार कभी ना सह पाए, पेड़ उखड़ जायेगा। कुछ ही फल लगते हैं। ये ग्यारह भावनाएँ फूल की तरह हैं और ये भावनाएँ विकसित होते-होते जब अपने चरम रूप को प्राप्त करती हैं तो धर्म भावना रूप फल को प्राप्त होती हैं। एक-एक भावनाओं के बल पर जब हम अपने मन को लीन करते हैं तब हमारे अन्दर धर्म के संस्कारों का प्रस्फुटन होता है और यही धर्म संस्कार हमें धर्म के प्रति दृढ़ता देता है। धर्मभावना का मतलब अपने मन को संस्कारों से भरना जो हमारी धर्म निष्ठा को दृढ़ बनाए, हमें धर्माचरण में प्रवृत्त करे। हम अपने सारे शुभ संकल्पों को आचरण में ढाल सकें। यह धर्मभावना का मूल अभिप्रेत है। संत कहते हैं कि धर्म के स्वरूप को समझो और समझो ही नहीं बल्कि उसे स्वीकारो। निचोड़ के रूप में यह बात अपने दिल-दिमाग में बैठा लो कि धर्म ही हमारे जीवन का त्राता है।






