दिव्य विचार: श्रद्धा से जीवन निहाल हो जाता है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि जिस मनुष्य के अन्तरंग में ऐसी श्रद्धा बलवान हो जाती है उसका जीवन निहाल हो जाता है। सम्यग्दृष्टि में ऐसी कोई मूढ़ता नहीं होती। अपनी आत्मा के विषय में उसकी समझ एकदम स्पष्ट होती है। वह जानता है कि ये सब चीजें एक संयोग हैं। मेरी नहीं हैं। और हो भी नहीं सकती हैं। अब तक मैं अपनी भ्रमपूर्ण मान्यता के कारण इनमें विमुग्ध हो रहा था लेकिन अब मैंने वास्तविकता को जान लिया। अब मैं कभी भी इस तरफ देख नहीं सकता हूँ। जो संसार के संयोगों में मूढ़ नहीं बनता है, वही अमूढ़दृष्टि सम्यक्त्वी है। प्राप्त करें अपनी प्रज्ञा को हम बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। ध्यान रखना पर से प्रभावित दृष्टि का नाम मूढ़ता है और स्वयं में भावित दृष्टि का नाम अमूढ़ता है। सम्यग्दृष्टि पर से प्रभावित नहीं होता, अपितु स्वयं से भावित होता है। अभी तक हम पर से प्रभावित हो रहे हैं। चाहे व्यक्ति हो या वस्तु, ये हमें बहुत जल्दी अपनी ओर खींच लेती हैं। लेकिन जब हम स्वयं में भावित होंगे तो पर का प्रभाव अपने आप खत्म हो जायेगा। फिर हमें संसार का बड़े-से-बड़ा आकर्षण भी अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर पायेगा। इस दृष्टि को प्राप्त करें। उसी दृष्टि की उपलब्धि का नाम प्रज्ञा की उपलब्धि है। और प्रज्ञा हमारे भीतर का सम्यक्त्व है, उसको प्राप्त करें। जैसे दीपक की निर्वात शिखा हमेशा निष्कम्प रहती है। वैसे ही अमूढदृष्टि सम्यक्त्वी हमेशा अविचल बना रहता है। दुनिया की कोई ताकत उसकी श्रद्धा को हिला नहीं सकती है। उसकी मान्यता को प्रभावित नहीं कर सकती है। इस तरह आध्यात्मिक मूढता से अपने आपको बचायें। लेकिन क्या करें, संसार के सारे प्राणी मूढ़दृष्टि हैं और ऐसे मूढदृष्टियों के सामने कभी-कभी दृष्टि सम्पन्न लोगों को बहुत दिक्कत हो जाती है। मूढ़ों के बीच में कोई समझदार चला जाये तो उसे बहुत दिक्कत होती है।






