दिव्य विचार: ममता ही बांधती है सांसारिक बंधन में- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि तब तक सम्यक्त्व की ज्योति प्रकट नहीं हो सकती है। ये मेरे नहीं हैं, अन्तरंग से इस प्रतीति का नाम ही अमूढ़ दृष्टित्व की उपलब्धि है। जा वसुधा काहू की ना भई सम्यग्दृष्टि इस रहस्य को जानता है। मैं कहता हूँ, मेरा है, मेरे बाप-दादा भी कहते थे कि मेरा है, पर जो-जो कहता थे कि मेरा है, वे सब लोग चले गये और चीजें वहीं की वहीं हैं । आज तुम कह रहे हो कि मकान मेरा है, कल तुम्हारे बेटे कहेंगे कि मकान मेरा है, परसों तुम्हारे पोते कहेंगे कि मकान मेरा है। लेकिन न तुम रहोगे, न तुम्हारा बेटा रहेगा और न तुम्हारे पोते रहेंगे। जबकि मकान जहाँ का तहाँ खड़ा रहेगा। फिर किससे कहें कि मकान तुम्हारा है। जो तुम्हारा है वह तुम्हारे भीतर है और जो बाहर है वह तुम्हारा हो नहीं सकता है। इस बोध को प्राप्त होने वाला व्यक्ति ही सम्यक्त्व से आविर्भूत होने का सौभाग्य प्राप्त करता है। उसके भीतर ही सम्यक्त्व प्रकट हो पाता है। हम भटक रहे अपने अज्ञान से इसे पहचानें कि बाहर की कोई भी चीज़ मेरी नहीं है, यह अन्दर से श्रद्धान बन जाये । ममत्व से पूर्णतः मुक्त नहीं हुआ जा सकता है, यह मैं मानता हूँ लेकिन अपनी मान्यता के ममत्व को तो हटाया जा सकता है। धारणा तो ऐसी बन जाये कि यह शरीर ही मेरा नहीं है तो संसार की अन्य वस्तुएँ मेरी कैसे हो सकती हैं ? आज तक अज्ञानता से अभिशप्त होकर मैं पर-पदार्थों को अपना मानता रहा हूँ और इसलिये संसार में भटका हूँ। यही मेरे बन्धन का कारण है। यह संसारी प्राणी अपनी ममता के कारण बन्धन को प्राप्त होता है और ममत्व को त्यागने से मुक्त हो जाता है। इस रहस्य को जानो और अपने अन्दर पलने वाले ममत्व का उन्मूलन करो। यदि तुम्हारे मन की ममता नष्ट हो गयी तो फिर तुमसे बड़ा सुखी संसार में कोई दूसरा नहीं है, क्योंकि ममता में ही बन्धन है और बन्धन में ही दुःख है। सच्चे अर्थों में मन की ममता ही हमें दुःखी करती है। जब मनुष्य के अन्दर उस ममता का विसर्जन हो जाता है तब समता का आविर्भाव होता है और उसी समता का नाम परम सुख है।






