दिव्य विचार: सहयोग की भावनाएं बढ़ाएं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि ऐसी विशालता यदि हमारे जीवन में आ जाये तो हमारा जीवन धन्य हो जाये। हम व्यक्ति को जितनी जल्दी प्रेम से बदल सकते हैं, फटकार से नहीं। इसलिये प्रेम हमारे जीवन का मूलमन्त्र होना चाहिये। यह हमारी आत्मा की आन्तरिक चेतना है। इसकी तरफ हमें देखना चाहिये। कोई व्यक्ति कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो उसके पाप से घृणा करो, पर उस व्यक्ति के लिये अपने अन्तरंग में स्थान बनाकर रखो। मैं कहना चाहता हूँ कि घर में हम एक फटा हुआ कपड़ा केवल इसलिये सम्हाल कर रखते हैं कि फर्श साफ करने के काम आयेगा। भैया, समाज का यदि कोई अंग कटा-फटा है तो उसे भी सम्हाल कर रखो, वह भी कहीं काम में आयेगा ही। उसका उपयोग करो। सबके प्रति प्रेम और सहयोग की भावना हो। सबके प्रति समानता का भाव हो। सम्यग्दर्शन का वात्सल्य अंग हमें यही कहता है कि ऐसी भावना हमारे अन्दर होनी चाहिये। बन्धुओं, धर्म और समाज एक-दूसरे के पूरक हैं। ऐसा मैंने कल आपसे कहा था। समाज के बिना धर्म को संरक्षण नहीं मिलता और धर्म के अभाव में समाज में अनुशासन नहीं रहता है। दोनों चीजें साथ-साथ चलती हैं। इसलिये इनको हम साथ-साथ लेकर चलें। आचार्य समन्तभद्र की यह उक्ति बहुत ही ज्यादा उपयोगी है - न धर्मो धार्मिकैर्बिना। धर्मात्माओं के बिना धर्म नहीं टिकता है। धर्मात्मा जब एक-दूसरे से मिलकर रहते हैं तभी उनमें संगठन रहता है। तभी उनमें सहयोग की भावना बनती है। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो सब कुछ नष्ट हो सकता है। इसलिये उस वृत्ति को आत्मसात् करने की परिपूर्ण कोशिश होनी चाहिये। निश्चित ही हमारे जीवन में एक बहुत बड़ी उपलब्धि घटित होगी। जिस तरह हम शरीर के एक-एक अंग का ध्यान रखते हैं, उसी तरह हमें समाज के एक-एक सदस्य का भी उचित ध्यान रखना चाहिये। शरीर का कोई अंग अगर कमजोर हो जाता है तो आप लोग क्या करते हैं? उसका उपचार करते हैं या नहीं ? क्योंकि शरीर का कोई भी अंग यदि कमजोर होगा तो शरीर के प्रायः प्रत्येक क्रियाकलापों में व्यवधान होगा।






