दिव्य विचार: कभी भी किसी से नफरत नहीं करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: कभी भी किसी से नफरत नहीं करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि शरीर की अपवित्रता को न देखकर आत्मा के गुणों का आदर करना निर्विचिकित्सा अंग का व्यावहारिक रूप है। और कभी किसी के प्रति घृणा न करना, कभी किसी से नफरत न करना इसका आध्यात्मिक रूप भी है। बन्धुओं, घृणा एक काषायिक परिणति है, जो हमारी आत्मा को विकृति से भर देती है। ध्यान रखना, कि सम्यक्त्वी तो परम प्रेम का उपासक होता है और घृणा एवं प्रेम कभी एक साथ नहीं रह सकते हैं। यदि हमारे मन में किसी के प्रति घृणा का भाव है तो वहाँ प्रेम पनप नहीं सकता है। और जहाँ प्रेम का भाव है वहाँ घृणा नहीं पनप सकती है। यदि अपने जीवन का उद्धार करना चाहते हो तो प्रेम के बीज बोना शुरू करो। प्रेम के फूल खिलाओ, घृणा के काँटे नहीं और प्रेम के फूल तभी खिलेंगे जब तुम सद्भाव का बीज बोओगे। अपने मन के अन्दर के दुर्भावों को दूर करने की कोशिश करो। अपने हृदय की घृणा को दूर करने की कोशिश करो। हमारे अन्दर की घृणा तभी दूर होगी जब हम प्रत्येक व्यक्ति के गुणों के प्रति प्रीति रखना शुरू करेंगे। गुणों का आदर करना शुरू कर दो आपके अन्दर प्रेम की अभिव्यक्ति होना शुरू हो जायेगी। लेकिन हम हैं कि दूसरों के गुणों को स्वीकारना ही नहीं चाहते, दोषों को तो हम बहुत देखते हैं, पर गुणों को हम कम देख पाते हैं। हम अपने थोड़े से गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने में माहिर हैं, और दूसरों के छोटे से दोष को विस्तार देने में सक्षम हैं। दूसरों के गुण हमें दिखाई नहीं पड़ते और अपने अवगुण हमें पहचानने में नहीं आते, यह हमारी कमजोरी है। इस कमजोरी को दूर करें। सन्त कहते हैं - यदि तुम प्रेमपूर्ण व्यवहार बनाना चाहते हो तो सबसे पहले उसके गुणों का आदर करना सीखो और गुणों के आदर के साथ-साथ उसकी प्रशंसा करना सीख जाओ। अगर आप एक-दूसरे की प्रशंसा करना शुरू कर दोगे तो आपके मन में कभी वैमनस्य का भाव नहीं होगा। अगर आप किसी की प्रशंसा नहीं करोगे तो आपके अपने भी आपसे दूर हो जायेंगे। आज लोग प्रशंसा करने में बहुत पिछड़ जाते हैं। घर-परिवार हो या समाज, कहीं भी रहो, एक-दूसरे की प्रशंसा करो।