दिव्य विचार: झूठी प्रशंसा करने वालों से रहे सावधान- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि प्रशंसा और प्रोत्साहन वह खुराक है जो मरणासन्न में भी प्राण फूंक देती है। आप व्यक्ति की प्रशंसा करके उससे चाहे जो करा सकते हो और आलोचना करके अपने घनिष्ठ मित्र को भी पराया बनाया जा सकता है। याद रखो, प्रशंसा करो, पर झूठी प्रशंसा मत करो और झूठी प्रशंसा करने वालों से सावधान भी रहना। यह एकदम चापलूस किस्म के लोग होते हैं। सामने प्रशंसा करेंगे और पीठ पीछे निन्दा करेंगे। ऐसे लोग बड़े खतरनाक होते हैं। चापलूसी नहीं, सही प्रशंसा करो। यदि तुम्हें किसी में कोई गुण दिखाई देता है तो बेझिझक प्रशंसा करो। आप निन्यानवें बुराईयों की बुराई मत करो, पर एक अच्छाई की प्रशंसा करना शुरू कर दोगे तो वे सभी तुम्हारे कायल बन जायेंगे। लेकिन हम देखें, कि अपने सम्बन्धों को हम किस स्तर पर स्थापित करते हैं। किसी से प्रेम और आत्मीयता के सम्बन्ध बनाने में हमें वर्षों का समय लग जाता है, घृणा और विद्वेष के सम्बन्ध हम एक पल में बना लेते हैं। आप विचार करें, अपने मन का अन्तर विश्लेषण करके देखें, कि दुनिया में जितने भी आपके सम्बन्ध हैं, उनमें प्रेम और आत्मीयता के सम्बन्ध कितने हैं और घृणा तथा विद्वेष के सम्बन्ध वाले लोग कितने हैं? यदि आपने प्रेम को विस्तार दिया होगा तो तुम्हारे संबंध प्रेम पूर्ण होंगे और यदि तुमने घृणा को अवकाश दिया होगा तो तुम्हारे संबंध घृणा और विद्वेष से भरे होंगे। संत कहते है कि -घृणा नहीं, प्रेम को अपनाने की कोशिश करो। हमारा धर्म तो केवल प्रेम का पाठ पढ़ाता है इसीलिए निंरतर हमारी दृष्टि उसी प्रेमपूर्ण जीवन की ओर होनी चाहिए? बंधुओ, घृणा का कार्य तो हमने बहुत किया पर किसी के प्रति घृणा करना जीवन का सबसे घृणित कार्य है। घृणा के योग्य कोई है ही नहीं? किससे घृणा करते हो? तुममे और उसमें अंतर क्या है। सब तुम्हारा ही तो अपना प्रतिबिम्ब है। तत्वतः किसी में कोई अंतर नहीं। दूसरों से घृणा करना यानी खुद से ही घृणा करना है। दूसरों से नफरत करना खुद से ही नफरत करना है।






