दिव्य विचार: कभी भी किसी से ईर्ष्या मत करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि घृणा हमारे मन में उत्पन्न होने वाली ईष्या का परिणाम है। जब किसी के गुणों के प्रति हमारे मन में असहिष्णुता बढ़ने लगती है तो उसके प्रति हमारे मन में घृणा उत्पन्न होने लगती है और यह घृणा हमारे सम्बन्धों में दरार डालना शुरू कर देती है। इसलिये कभी किसी के साथ ईर्ष्या मत करो। किसी के प्रति ईर्ष्या करना अपने आन्तरिक ऐश्वर्य को नष्ट करना है। जो व्यक्ति ईर्ष्या में जीते हैं, उनका आन्तरिक ऐश्वर्य नष्ट हो जाता है और जो व्यक्ति प्रेम में जीते हैं उनका आन्तरिक ऐश्वर्य प्रकट हो जाता है। कुरलकाव्य में लिखा है - जो लोग ईर्ष्या करते हैं लक्ष्मी उनके घर को अपनी बड़ी बहिन दरिद्रता की देखरेख में छोड़कर चली जाती है। वस्तुतः ईर्ष्या करना अपने ऐश्वर्य को खोना है। इससे अपने आपको बचाओ। यह ओछी मानसिकता की अभिव्यक्ति है। अपने हृदय को औदार्य से भरें। जब हमारी मानसिकता संकीर्ण हो जाती है तब हमारा जो चित्त है वह सीमित हो जाता है और जब वही मानसिकता विशाल और व्यापक बनती है तो अन्दर की सोच विस्तीर्ण हो जाती है। वस्तुतः सोच के विस्तार में हृदय आकाश बन जाता है, जो सबको स्थान दे देता है और सोच की संकीर्णता में हमारा हृदय अत्यन्त क्षुद्र बन जाता है, अपनों को भी प्रवेश देने में अक्षम बन जाता है। बन्धुओं, अपने हृदय को आसमान सा विशाल बनाइये। सबको स्थान देने का प्रयास कीजिये। हमारा धर्म केवल हमें यही पाठ पढ़ाता है। ऐसा पाठ पढ़ने में यदि हम सक्षम होते है, तो हमारा जीवन निहाल हो जायेगा और यदि इस पाठ से हम वंचित रहते है, तो कभी भी हम अपने जीवन का उद्धार करने में समर्थ नहीं हो सकते हैं। इसलिए गुणों को आदर देना शुरू कीजिये। घृणा को दूर रखने का प्रयास कीजिये। परम ऐश्वर्य को प्राप्त करने की कोशिश कीजिये। निश्चित ही वह हमारे जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। परंतु आजकल हम ऐसा कहां कर पा रहे हैं। हमारी दृष्टि अत्यंत संकीर्ण होती जा रही हैं। हम दूसरों के दोषों को भी देखते हैं। दूसरों के गुणों को देखने की उदारता हम नहीं दिखाते हैं। इससे हमारा जीवन दूषित हो रहा है।






