दिव्य विचार: मानव जीवन का सदुपयोग करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: मानव जीवन का सदुपयोग करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि वही व्यक्ति अपने जीवन की उपेक्षा करता है, जीवन के प्रति लापरवाह होता है, जिसे अपने जीवन का मूल्य पता नहीं । संत कहते हैं - ध्यान रखना, जगत् के जितने भी पदार्थ हैं, उनका तो फिर भी कोई मूल्य है, जीवन तो अमूल्य है। जीवन रूपए-पैसे से खरीदा नहीं जा सकता। कितनी भी कीमत लगाकर हम जीवन को खरीद नहीं सकते। इस दुर्लभ जीवन के महत्त्व को समझें और सिर्फ समझें ही नहीं बल्कि इसका लाभ लेने के बारे में भी सोचें। लेकिन व्यक्ति को जीवन का महत्व तब समझ में आता है, जब वह मरने को होता है। जीते जी आदमी जिंदगी के महत्व को नहीं समझता। जो चीज़ हमारे पास होती है हम उसके प्रति लापरवाह होते हैं। आपने कभी ख्याल किया, चौबीसों घंटे श्वाँस आती-जाती है, पर हम तब तक उसकी कीमत को नहीं पहचानते, जब तक सांस अवरुद्ध नहीं हो जाती। सांस लेने में तकलीफ होने लगती है, तब डाक्टर के पास जाकर आक्सीजन लगवाते हैं। मुँह में बत्तीस दाँत हैं, चौबीस घंटे में एक बार भी जीभ वहाँ नहीं जाती। उसमें से एक दाँत बाहर आ जाए तो चौबीसों घंटे जीभ वहीं जाएगी। क्या बात है ? जब तक दाँत था, तब तक जीभ वहाँ नहीं गयी। अब जीभ क्यों जा रही है ? क्योंकि दाँत के अभाव का अहसास हो रहा है। सद्भाव जब तक होता है, तब तक उसका मूल्यांकन नहीं करते। जब कोई चीज़ छूटने लगती है तब हमें समझ में आती है, यह चीज़ कितनी कीमती थी। जिंदगी की कीमत उस व्यक्ति से पूछो - जो मरणासन्न है, जो कह रहा है कि मुझे इतनी बड़ी जिंदगी मिली ज़रूर, पर मैं कुछ कर नहीं पाया। काश, मुझे थोड़ा समय और मिल जाये तो मैं अपनी शेष इच्छा पूरी कर लूँ। मृत्यु किसी को भी एक पल की मोहलत नहीं देती। मृत्यु तो निश्चित है और वह आएगी ही। जो जिंदगी का 'उपयोग नहीं कर सका, वह अन्तिम क्षण में भी उसका उपयोग नहीं कर सकता । बोधिदुर्लभभावना हमें केवल यही प्रेरणा देती है कि जीवन के जितने भी अनुकूल संयोग हैं, उन सबको दुर्लभ मानो, उस दुर्लभता को समझो और उनका सदुपयोग करो।