दिव्य विचार: जीवन का सबसे बड़ा धन चरित्र- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी ने कहा कि जीवन का सबसे बड़ा धन यदि कुछ है तो वह मनुष्य का चरित्र धन है। जो संस्कारों की पवित्रता से ही प्रकट होता है। बुरी आदतों से बचने पर ही प्रकट होता है। इसलिए अपने चरित्र के प्रति जो व्यक्ति शुरू से ध्यान रखते हैं और सजग रहते हैं उनके जीवन में बुराईयां कभी पनपती नहीं है। इसलिए बुराईयों से बचने के लिए दृढ़ संकल्प लें, बुराईयों के परिणाम को देखें और सत्संगति रखें। उन्होंने कहा कि अच्छी संगति करने से व्यक्ति के जीवन में बड़े-बड़े परिवर्तन आते हैं। अच्छे लोगों की संगति कीजिए। ऐसे लोगों के साथ रहिए जिससे आपके सोच का स्तर बढ़ता हो, जिससे आपकी चिंतनधारा अच्छी होती है। उन्होंने कहा कि आज तो पूरा परिवेश ही उल्टा हो गया है। आज अच्छे-अच्छे लोग बिगड़ जाते हैं। शिक्षित लोगों में कई तरह के दुर्व्यसनों की प्रवृतियां बढ़ गई हैं। इसके पीछे भी आज के शिक्षण संस्थानों की सबसे अधिक जवाबदेही है। स्कूल तक की लाइफ अलग होती है बड़ा अनुशासन होता है, लेकिन स्कूल के बाद बच्चे जैसे ही कॉलेज में जाते हैं उनके पास पूर्ण उन्मुक्तता और आजादी आ जाती है। वहीं उनके जीवन में शिथिलता आने लगती है। मुनिश्री ने कहा कि वर्तमान में माता-पिता उच्च शिक्षा संस्थानों में अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए भेजते हैं, लेकिन उनके संस्कारों की तरफ कभी ध्यान नहीं देते हैं। आज कल माता-पिता में भी यह कमी है कि वो अपने बच्चों की पढ़ाई का तो पूरा ख्याल रखते हैं लेकिन बच्चों में संस्कारों के प्रति उनमें कोई गंभीरता नहीं दिखाई देती। मुनिश्री ने कहा कि शिक्षा होनी चाहिए, लेकिन ध्यान रखो, वही शिक्षा सार्थक है जिसके साथ संस्कार है। उन्होंने कहा कि गुरु चरणों में कुछ लाभ लेना है तो दर्शनार्थी बनकर मत आओ शरणार्थी बनकर आओ। भोजन तीन प्रकार के होते हैं। तामसिक भोजन करने वाला भोगी होता है, राजसी भोजन करने वाला रोगी और सात्विक भोजन करने वाला योगी होता है।






