दिव्य विचार: फिजूल की बातें दिमाग से निकालिए- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि परलोकभय, वेदनाभय और आकस्मिक भय। कई लोग ऐसे होते हैं, जिनके मन में उल्टा ही आता है, अच्छा नहीं आता । अरे एक्सीडेंट न हो जाये, घाटा न लग जाये, बीमार न हो जायें, कोई हमसे गुस्सा न हो जाये, लड़ाई न हो जाये। अच्छा नहीं सोचता। यह भी दुर्बलता है। यह नकारात्मक सोच का नतीजा है। ध्यान रखना, मनुष्य का जैसा नज़रिया होता है वैसा ही उसका जीवन होता है। जो व्यक्ति नकारात्मक नज़रिये से भरा रहेगा वह जीवन के सार को प्राप्त नहीं कर सकता है। जिस व्यक्ति के पॉजिटिविटी बनी रहती है उस व्यक्ति के जीवन से बड़ा रस किसी के जीवन में आ नहीं सकता। फिजूल की बातें दिमाग से निकालिये। आपके मन में न जाने कैसी-कैसी कुशंकाएँ होती हैं। मान लो आपका लड़का पहली बार कहीं गया है। फ्लाईट से जा रहा है, तो आपके मन में यह बात नहीं आयेगी कि मेरा बेटा कितना अच्छा हो गया है कि आज पहली बार फ्लाईट से बॉम्बे जा रहा है। वह कितना सफल हो गया है। हाँ, यह बात ज़रूर आयेगी कि बेटा पहली बार फ्लाईट से जा रहा है, कहीं क्रैश न हो जाये ? कितना नकारात्मक नजरिया है। बेटा अकेले बाहर गया है। पर आपके मन में यह बात नहीं आती कि मेरा बेटा कितना योग्य हो गया, अकेले बाहर जाकर काम सम्हाल रहा है। पर आप सोचते हैं - अरे, अकेला गया है, कहीं किसी के चक्कर में न पड़ जाये। इसी बात का तो विचित्र चक्कर है। यह चक्कर ही बड़ा विचित्र है। यह जो आकस्मिक भय की चिन्ता मन में सताती रहती है कि ऐसा न हो जाये, वैसा न हो जाये। यह बहुत बड़ी दुर्बलता है। सम्यग्दृष्टि कहता है कि जो होना होता है, वह होता ही है। अब मुझे किसी चीज़ का भय नहीं है, अच्छा हो तो मुझे स्वीकार है, बुरा हो तो मुझे स्वीकार है। क्योंकि मैं तो अच्छे और बुरे में समभाव बनाकर जीने का आदी हूँ, उसका ही अभ्यासी हूँ, इसलिये अब मुझे अच्छे और बुरे की चिन्ता नहीं। ये जो अशुभभाव हैं, उसे मन से निकालिये ।






