दिव्य विचार: इच्छाओं पर नियंत्रण करना सीखें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि ध्यान रखना, इच्छा पूर्ति इच्छातृप्ति का साधन नहीं है। इच्छाओं का नियंत्रण करते समय कुछ पल के लिये कष्ट जरूर होता है लेकिन यह कुछ पल का कष्ट सारी जिन्दगी के आराम का साधन बन जाता है। जैसे किसी व्यक्ति के भीतर शरीर के किसी अंग में कोई तकलीफ हो और उसे सर्जरी कराना पड़े। सर्जरी कराते समय कष्ट तो जरूर होता है। पीड़ा तो भोगना ही पड़ती है। लेकिन इसके बाद जब सर्जरी हो जाती है तो उस पीड़ा से जिन्दगी भर के लिये आराम मिल जाता है। इच्छाओं के नियन्त्रण में कुछ पल का कष्ट जरूर होता है। लेकिन उससे चित्त को स्थायी आराम मिलता है। वह तुम्हारे भीतर के कैंसर को खत्म कर डालता है। यदि उसकी उपेक्षा करोगे तो वह बढ़ता ही जायेगा। उसका कोई अन्त नहीं है। इसलिये विषयों से विरक्त सम्यक्त्वी की विशेष पहचान होती है। वह भले ही आकांक्षा से रहित नहीं होता है लेकिन उसके मन में विषयों के प्रति बहुत ज्यादा लगाव भी नहीं होता है। विषयों के प्रति बहुत ज्यादा आसक्ति नहीं होती है। वह तो यह मानकर चलता है कि ये सब चीजें हेय हैं। संसार के हर सुख को वह अर्थहीन मानता है। उसे लगता है कि संसार में जो संयोग मिले हैं, अच्छे से अच्छे संयोग भी क्यों न हों, लेकिन वे स्थायी नहीं हैं। एक पल में राजा रंक होता है और रंक राजा बन जाता है, तो इस संसार में हम किसकी चाह रखें। ये तो क्षण-क्षण में परिवर्तित होने वाला है। पाप और पुण्य का खेल है। पुण्य की अनुकूलताएँ होती हैं तो संसार में अनुकूलताओं की बरसात होने लगती है। पाप का प्रकोप होता है तो सब हवा में बह जाते हैं। एक पल में खेल बदल जाता है। दुनिया का नामचीन व्यक्ति गुमनामी के अंधेरे में कहाँ खो जाये पता नहीं चलता। जो बहुत ख्यात है उसे कुख्यात होते देर नहीं लगती है, यही तो पुण्य और पाप का खेल है। जो इस पुण्य और पाप के खेल को जान लेता है उसके लिये ये सब अर्थहीन हैं और इनकी चाह करना केवल अज्ञान का परिणाम है।






