दिव्य विचार: व्यर्थ की बातों में न उलझें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि पहचानो, एक ज्ञानी और अज्ञानी में यही अन्तर होता है। ज्ञानी वस्तु के स्वरूप को जानता है इसलिये व्यर्थ की बातों में मुग्ध नहीं होता और अज्ञानी वस्तु के स्वरूप से अनभिज्ञ होने के कारण केवल बातों में ही उलझकर रह जाता है। हम उससे अपने आपको बचाने की कोशिश करें। जो सही है, जो सत्य है और जो साविक है उसका सत्कार करें। वस्तु का सत्कार करने वाला ही सम्यक्त्वी होता है। व्यर्थ में उलझ जाने वाला अज्ञानी है, मिथ्यात्वी है। अभी तक हम केवल व्यर्थ में उलझे हैं। हमारी सारी शक्ति, हमारी सारी क्षमतायें और हमारे सारे संसाधन उसमें लगे हैं, जो अर्थहीन है। सन्त कहते हैं कि व्यर्थ से हटकर सार्थक का उपयोग करो, तो तुम्हारा जीवन धन्य हो सकता है। अन्यथा ये सब चीजें यूं ही चली जायेंगी और जिन्दगी निरर्थक होकर नष्ट हो जायेगी। ज्ञानी जीवन के परम अर्थ को जानता है। जो अर्थवान है उसके ही पीछे लगता है इसलिए उसकी दृष्टि में संसार का सबसे बड़ा सुख भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं दिखता है। वह यही मान करके चलता है कि ऐसा तो मैं कई बार कर चुका हूँ। अनन्त जन्म हो गये मेरे, मैं इन्हीं के चक्कर में लगा हूँ। मैंने खूब पंचेन्द्रिय चीज़ों का विषयभोग किया है। लेकिन भोगों को भोगने के बाद मेरी आज तक भोगेषणा खत्म नहीं हुई। होगी भी कैसे ? ध्यान रखना पंचेन्द्रिय जीवों द्वारा विषयभोगों के माध्य से भोगेषणा को शान्त करने का प्रयत्न तो ऐसा ही है जैसे कोई व्यक्ति आग से आग बुझाने की कोशिश करे। क्या आग से आग आज तक कभी बुझी है ? आग को यदि बुझाना चाहते हो तो उसमें आग लगाने की जरूरत नहीं। आग को आग से नहीं बुझाया जा सकता। आग को केवल पानी से ही बुझाया जा सकता है। इसलिये विषयों की चाह तुम्हारे अन्तरंग में यदि प्रकट हो रही है तो विषयों की पूर्ति से नहीं अपितु विरक्ति के जल से बुझाने की कोशिश करो।






