दिव्य विचार: काम-भोग का दूर से ही तिरस्कार कर दो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि ऐसे ही ये सांसारिक विषय हैं, जो विष मिश्रित मिष्ठान्न की तरह हैं। खाते समय अच्छे जरूर लगते हैं। लेकिन खाने के बाद हजम करना संभव नहीं होता है। ध्यान रखना, दुनिया में जिन्होंने विषयों का आश्रय लिया वे विषय-भोग के समय उनको मोहक लगते हैं, पर अन्ततः वे पीड़ादायी ही होते हैं। जिसमें कण भर सुख और मन भर दुःख होता है। आचार्य कहते हैं कि - खणमित्त सुक्खा बहुकाल दुक्खा, पगाम सुक्खा अणिगाम दुक्खा। संसारमोक्खस्स विपक्खभूया, खाणि अणत्थाण उ कामभोया ।। एक क्षण का सुख और बहुत काल का दुःख । दुःख का कोई पैमाना नहीं। यह संसार की मुक्ति के विपक्षी हैं और सारे अनर्थों की खान हैं, इसलिये काम-भोग को दूर से ही तिरस्कार कर दो। उसे दूर ही कर देना चाहिये। ये दृष्टि केवल सम्यग्दृष्टि में ही विकसित होती है। बन्धुओ, ज्ञानी और अज्ञानी में बहुत अन्तर होता है इसलिये वह इन सब चीजों को, ये पाप की चीजें हैं, ऐसा जानकर उनके प्रति अनास्था का भाव रखता है उनसे दूर होने का मन रखता है। भले ही दूर न हो सके। लेकिन वह कहता है कि ये मेरे लिये हानिकारक है। दृष्टि तो बना लो। दो तरह की दृष्टि हैं- एक वह व्यक्ति जो पंचेन्द्रिय के विषयों को उपादेय मान करके चल रहा है और रात-दिन उसी के पीछे लगा है। जिसका साध्य केवल पंचेन्द्रियों के विषयों में लगा है और दूसरा वह व्यक्ति है, जो पंचेन्द्रिय के विषयों को छोड़ भले न पा रहा हो, लेकिन यह जान रहा है कि यह सब मेरे लिये जहर से भी ज़्यादा खतरनाक हैं। मेरे लिये उपादेय नहीं हैं। ये मेरे लिये हेय हैं। प्रथम भूमिका में आत्मा में ऐसी दृढ़ धारणा बन जाये तो समझ लेना कि तुम्हारे भीतर सम्यक्त्व की भूमिका तैयार हो गई। ऐसी धारणा बना लेना सम्यक्त्वी की पहचान है। वह यह मानता है कि ये सब चीजें मेरे लिये उपादेय नहीं हैं। ये सब चीजें मेरे लिये आलम्बनीय नहीं हैं। इसे मुझे छोड़ना है। इनसे जो मेरी हानि होगी वह बड़े से बड़े शत्रु से भी नहीं हो सकती इसलिए उन्हें हमे दूर से ही छोड़ने की जरूरत है।






